वेनेजुएला में जो हुआ, वह अमेरिका के लिए नया नहीं… सत्ता परिवर्तन की रणनीतियों और उनके विनाशकारी नतीजों का इतिहास पढ़ें…

शनिवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला में अमेरिकी सेना के एक ऐसे ऑपरेशन का खुलकर जश्न मनाया, जिसे उन्होंने एकदम सही बताया।

इस ऑपरेशन में स्पेशल फोर्सेज का हमला, हवाई हमले और नौसेना की तैनाती शामिल थी। नतीजा यह हुआ कि काराकास में निकोलस मादुरो को पकड़कर न्यूयॉर्क ले जाया गया।

टैक्टिकल नजरिए से यह मिशन पूरी तरह सफल रहा। अमेरिकी अधिकारियों ने पुष्टि की कि कोई भी अमेरिकी सैनिक मारा नहीं गया।

वेनेजुएला के नेता को सत्ता से हटा दिया गया और अमेरिकी हिरासत में ले लिया गया। ट्रंप जो ताकत के खुले प्रदर्शन को अहमियत देते हैं, उनके लिए यह एक ऐसा ऑपरेशन था जिसके तुरंत नतीजे मिले।

लेकिन, राजनीतिक तौर पर यह उन्हें कहीं ज्यादा खतरनाक स्थिति में डाल सकता है। समझते हैं कैसे?

एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे ट्रंप

सालों से ट्रंप ने अमेरिका की कभी न खत्म होने वाली लड़ाइयों के विरोध के आधार पर अपनी लोकप्रियता बनाई।

उन्होंने बार-बार इराक पर हमले की निंदा की और इसे एक बड़ी गलती बताया। साथ ही अपनी विदेश नीति को उस चीज के विरोध के रूप में पेश किया है जिसे वह और उनके समर्थक “नियोकॉन युद्ध” कहते हैं।

अमेरिकी नेता ने ‘शांति दूत’ बनने का वादा करके सत्ता में वापसी की थी, लेकिन एक साल बाद वह कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं।

अमेरिका का सत्ता परिवर्तन का लंबा रिकॉर्ड

अमेरिका के लिए आजाद और संप्रभु देशों की घरेलू राजनीति में दखल देना कोई नई बात नहीं है। पिछले 120 सालों में लगभग 35 विदेशी नेताओं को जबरन हटाने के लिए वॉशिंगटन जिम्मेदार रहा है।

विशेषज्ञ इसे विदेशी थोपा हुआ शासन परिवर्तन या फिर FIRC कहते हैं। अगर विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया भर में जबरन सत्ता परिवर्तन के लगभग एक-तिहाई मामलों में दस साल के अंदर गृह युद्ध होता है।

1954 में ग्वाटेमाला से लेकर 1989 में पनामा तक अमेरिका ने ऐसे नेताओं को हटाने के लिए बार-बार दखल दिया जिन्हें वह दुश्मन या अविश्वसनीय मानता था।

सिर्फ ग्वाटेमाला में ही उसने एक ही साल में तीन नेताओं को हटाने में मदद की, जिससे दशकों तक अस्थिरता और हिंसा फैली।

इराक में सद्दाम हुसैन के सुरक्षा तंत्र को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। सत्ता के लिए इस संघर्ष ने सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दिया, ईरान समर्थित मिलिशिया को ताकत दी और आखिरकार इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ।

इसी तरह अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा बनाई गई सरकार को पूरे देश में कभी वैधता नहीं मिली। भ्रष्टाचार, गुटबाजी और विदेशी मिलिट्री सपोर्ट पर निर्भरता ने इसे अंदर से खोखला कर दिया, जिससे तालिबान की वापसी का रास्ता साफ हो गया।

अमेरिका नहीं कर पाया तालिबान का खात्मा

कुछ ही घटनाएं वॉशिंगटन और हामिद करजई के बीच संबंधों से ज्यादा सत्ता परिवर्तन की संरचनात्मक कमियों को दिखाती हैं।

शुरुआत में अफगानिस्तान को एक पार्टनर के तौर पर पेश किया गया लेकिन करजई का अपने अमेरिकी समर्थकों के साथ आम नागरिकों की मौत, विद्रोहियों के साथ बातचीत और अमेरिकी मिलिट्री ऑपरेशन्स के दायरे को लेकर टकराव बढ़ता गया। समय के साथ यह रिश्ता खुलकर दुश्मनी में बदल गया।

2001 के आखिर में अमेरिका समर्थित सेनाएं काबुल में घुस गईं और कुछ ही हफ्तों में तालिबान का शासन खत्म कर दिया। अमेरिकी समर्थन से हामिद करजई को नया अफगान नेता बनाया गया।

राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने पूरे भरोसे से कहा कि सेंट्रल एशिया में लोकतंत्र जड़ें जमा रहा है। दो दशक बाद तालिबान उतनी ही तेजी से सत्ता में वापस आ गया, जितनी तेजी से उसे हटाया गया था।

वो नतीजे जो आज भी मिडिल-ईस्ट को कर रहे प्रभावित

इराक में अमेरिकी सैनिकों ने 2003 में इसी तरह की तेजी से सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया था।

वाशिंगटन ने एक लोकतांत्रिक बदलाव का वादा किया था, लेकिन एक लंबे समय तक चली बगावत, सांप्रदायिक गृह युद्ध, क्षेत्रीय अस्थिरता और तथाकथित इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ – ये ऐसे नतीजे हैं जो आज भी मिडिल ईस्ट को प्रभावित कर रहे हैं।

जब अमेरिका दुनिया को फिर से व्यवस्थित करने का फैसला करता है तो उसकी शक्ति का एक जाना-पहचाना पैटर्न होता है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में डोनल्ड ट्रंप के ताजा विदेशी दखल को समझा जाना चाहिए।

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