युद्ध की असली कीमत सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि भविष्य से चुकानी पड़ती है; अमेरिकी अर्थशास्त्री ने दुनिया के सामने रखा यह कड़वा सच…

इतिहास गवाह है कि युद्ध की घोषणा होते ही पूरी दुनिया का ध्यान सेनाओं की आवाजाही और तात्कालिक नुकसान पर केंद्रित हो जाता है। लेकिन 1916 में अमेरिकी अर्थशास्त्री जेएम क्लार्क ने एक कड़वा सच दुनिया के सामने रखा था।

क्लार्क का कहना था कि युद्ध की असली कीमत वह नहीं है, जो आज के बजट से खर्च हो रही है, बल्कि वह है, जो आने वाले कल के उत्पादन और विकास से छीनी जा रही है। आज पश्चिम एशिया के संकट को देखें तो क्लार्क की बातें शत-प्रतिशत सच साबित हो रही हैं।

सैन्य अभियान पर होने वाला प्रत्यक्ष खर्च

  • 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तो शुरुआती छह दिनों मेही पेंटागन ने 11.3 अरब डालर फूंक दिए।
  • यह खर्च प्रतिदिन 90 करोड़ डॉलर के करीब बैठता है लेकिन यह तो केवल “दिखने वाला खर्च है, जैसे गोला-बारूद, ईंधन और रसद।
  • इसमें अगले 30 सालों तक घायल सैनिकों की देखभाल और उनके पुनर्वास पर होने वाला खर्च शामिल नहीं है। अर्थशास्त्री इसे राजकोषीय बोझ कहते हैं, जो आने वाले दशकों तक सरकारी बजट को दबाए रखता है।

ऊर्जा संकट और वैश्विक बाजार पर प्रहार

युद्ध का सबसे पहला और घातक प्रहार ऊर्जा संसाधनों पर हुआ है। फरवरी के अंत में जो कच्चा तेल (ब्रेट क्रूड) 72 डालर पर था, मार्च के मध्य तक वह 113 डालर तक पहुंच गया यानी महज कुछ हफ्तों में 83 प्रतिशत की भारी वृद्धि। इसका सीधा कारण है होर्मुज जलडमरूमध्य। यह दुनिया की वह नली है जिससे वैश्विक तेल-गैस का 20 प्रतिशत और हीलियम का 33 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है।

ईरान की रणनीति साफ है। वह युद्ध को मैदान में जीतने के बजाय इसे आर्थिक मोर्चे पर ले गया है। जलमार्गों को असुरक्षित बनाकर और तेल की कीमतों को बढ़ाकर वह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाने की कोशिश कर रहा है।

सप्लाई चेन पर संकट

कतर दुनिया का बड़ा हीलियम उत्पादक है। हीलियम का उपयोग चिप बनाने वाली मशीनों को ठंडा रखने के लिए होता है। उत्पादन रुकने से दक्षिण कोरिया और ताइवान की चिप निर्माता कंपनियां संकट में हैं। जब चिप नहीं बनेंगे, तो पूरी दुनिया में कारों से लेकर लैपटाप तक हर चीज महंगी और दर्लभ हो जाएगी। इसे ही सप्लाई चेन का टूटना कहते हैं।

युद्ध का असली चेहरा

युद्ध के मैदान में कौन जीता और कौन हारा, यह इतिहास की किताबों का हिस्सा बन जाता है। लेकिन असल हार उस आम नागरिक की होती है जिसे महंगाई, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है। क्लार्क के शब्द आज भी गूंजते हैं।

‘युद्ध राजकोष से पैसा नहीं लेता, वह भविष्य से उसकी संभावनाएं छीन लेता है।’ आज जो 90 करोड़ डालर रोजाना खर्च हो रहे हैं, वे दरअसल कल के स्कूल, अस्पताल और नई तकनीकों की बलि दे रहे। दे रहे हैं। युद्ध खत्म हो सकता है, लेकिन इसकी ‘अप्रत्यक्ष कीमत आने वाली कई नस्लों को चुकानी पड़ती है।

अप्रत्यय लागत, जो उत्पादन कमी नहीं होगा

जेएम क्लार्क ने अप्रत्यक्ष लागत की अवधारणा दी थी। इसका मतलब है वह पैसा या सामान जो पैदा हो सकता था, लेकिन युद्ध के कारण कभी नहीं हुआ। दुनिया का सबसे बड़ा गैस भंडार नार्थ फील्ड और साउथ पार्स कतर और ईरान के बीच बंटा है। इजरायल और ईरान के हमलों ने इसके बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यहां की 90 प्रतिशत गैस अगले एक दशक तक जमीन के नीचे ही दबी रहेगी, क्योंकि इसे निकालने वाली मशीनरी नष्ट हो चुकी है। यह वह दौलत है, जो आने वाले 10 सालों में दुनिया को मिल सकती थी, लेकिन अब कभी नहीं मिलेगी।

हमलों के जद में है खाड़ी देशों के विकास का मॉडल

पिछले एक दशक में सऊदी अरब, यूएई और कतर ने अपनी छवि तेल बेचने वाले देशों से बदलकर ‘ग्लोबल हब’ के रूप में बनाई थी। उन्होंने पर्यटन, तकनीक और व्यापार में खरबों डालर निवेश किए।

गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि इस युद्ध के कारण:

  • बहरीन और कतर की 10 फीसदी जीडीपी में तक की गिरावट आ सकती है। यूएई और सऊदी अरब की अर्थव्यवस्थाएं भी 10 प्रतिशत 5-8 प्रतिशत तक सिकुड़ सकती हैं।
  • ईरान का उद्देश्य सीधा है-इन देशों द्वारा पिछले 10 सालों में की गई तरक्की और आर्थिक विविधीकरण को नष्ट करना।

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