आरोपी से ‘निष्पक्ष सुनवाई’ का मौलिक अधिकार छीना नहीं जा सकता, हाई कोर्ट का अहम फैसला…

बांबे हाई कोर्ट ने मंगलवार को 2017 में एक लड़की के दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि रद कर दी और पुनर्विचार का आदेश दिया, क्योंकि पिछली कार्यवाही के दौरान उसका प्रतिनिधित्व किसी वकील ने नहीं किया था।

न्यायमूर्ति सारंग कोटवाल और संदेश पाटिल की खंडपीठ ने कहा कि यद्यपि अपराध ”भयानक और गंभीर” था। सात वर्षीय पीड़िता का परिवार अभी भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। फिर भी आरोपित को ”निष्पक्ष सुनवाई के उसके मौलिक अधिकार” से वंचित नहीं किया जा सकता।

आरोप तय होने से लेकर महत्वपूर्ण गवाहों की जांच तक आरोपित का प्रतिनिधित्व किसी वकील ने नहीं किया। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपित को अपना बचाव करने का अवसर भी नहीं दिया गया। यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

पीठ ने कहा कि नासिक स्थित विशेष न्यायालय ने मामले की सुनवाई को समाप्त करने में अनावश्यक जल्दबाजी दिखाई। पीठ ने कहा कि नि:स्संदेह यह एक गंभीर मामला था। मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाना आवश्यक था, लेकिन निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों की कीमत पर ऐसा नहीं किया जा सकता था।

इस मामले को विशेष रूप से अदालत को वापस भेजते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि इस बार अदालत को यह सुनिश्चित करने के लिए सभी सावधानियां बरतनी होंगी कि मुकदमा आरोपित और अभियोजन पक्ष दोनों के लिए निष्पक्ष तरीके से चलाया जाए।

हाई कोर्ट ने कहा कि मुकदमा दस महीने के भीतर समाप्त होना चाहिए। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अप्रैल 2017 में आरोपित ने लड़की को पास की एक दुकान पर जाकर अपने लिए तंबाकू और चॉकलेट खरीदने को कहा।

जब वह तंबाकू देने के लिए उसके घर गई तो उसने कथित तौर पर उसके साथ दुष्कर्म किया और फिर उसकी हत्या कर दी। नासिक की विशेष अदालत ने मई 2019 में आरोपित को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई।

इस मामले को अदालत में वापस भेजते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि इस बार निचली अदालत को यह सुनिश्चित करने के लिए सभी सावधानियां बरतनी होंगी कि मुकदमा आरोपित और अभियोजन पक्ष दोनों के लिए निष्पक्ष तरीके से चलाया जाए।

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