स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट: ईरान की रणनीति और ट्रंप की सहयोगी देशों की तलाश, कैसे बन सकता है नया गठबंधन?…

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध के दो हफ्तों में यह साफ हो गया है कि जहां अमेरिका और इजरायल सैन्य ताकत में आगे हैं, वहीं ईरान अलग तरीके से जवाब दे रहा है।

खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करके उसने दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर दबाव बना दिया है। ऐसे में अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में यह तय होगा कि यह युद्ध किस दिशा में जाएगा। ईरान की रणनीति अमेरिका पर दबाव बनाकर युद्ध को जल्दी खत्म कराने की है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से युद्ध से पहले करीब 20% तेल की सप्लाई होती थी। फिलहाल यहां जहाजों की आवाजाही लगभग ठप है और सैकड़ों जहाज फंसे हुए हैं।

ईरान की रणनीति

इस संघर्ष में तीन तरह की स्थिति देखी जा रही है। पहली है सीधी सैन्य टक्कर, जिसमें अमेरिका और इजरायल मजबूत स्थिति में हैं। दूसरी है युद्ध को फैलाने की कोशिश, जिसमें ईरान खाड़ी देशों, जॉर्डन, तुर्की और अजरबैजान को निशाना बनाकर उन्हें अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए प्रेरित करना चाहता है।

तीसरी और सबसे अहम रणनीति है असमान जवाब, जिसमें ईरान आतंकवाद, साइबर हमले या आर्थिक नुकसान जैसे तरीके अपनाता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना इसी रणनीति का हिस्सा है।

क्यों जरूरी है गठबंधन

विशेषज्ञों के अनुसार ईरान की इस असमान रणनीति का जवाब अकेले अमेरिका के लिए देना मुश्किल है। इसके लिए कई देशों का एक साथ आना जरूरी है। पहले भी अमेरिका ऐसे गठबंधन बना चुका है।

साल 2014 से 2018 के बीच अमेरिका ने करीब 80 देशों का गठबंधन बनाकर ISIS के खिलाफ अभियान चलाया था। इसी तरह 2023-24 में रेड सी में जहाजों की सुरक्षा के लिए करीब 20 देशों का एक समुद्री गठबंधन बनाया गया था, जिसमें ब्रिटेन और डेनमार्क जैसे देश शामिल थे।

कानूनी आधार क्या है?

किसी भी सैन्य गठबंधन के लिए कानूनी मंजूरी जरूरी होती है। आमतौर पर इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र से होती है। हाल ही में 135 देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें ईरान के हमलों की निंदा की गई और सामूहिक आत्मरक्षा का अधिकार भी माना गया। इससे कई देशों के लिए इस मिशन में शामिल होने का रास्ता साफ हो सकता है।

हालांकि सिर्फ कानूनी मंजूरी काफी नहीं होती, घरेलू राजनीति भी बड़ी बाधा बनती है। हर देश की सरकार को अपने लोगों का समर्थन चाहिए होता है।

यहां अमेरिका को मुश्किल आ सकती है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने पहले सहयोगी देशों से ज्यादा सलाह-मशविरा नहीं किया। ब्रिटेन और डेनमार्क जैसे देश, जिनके पास मजबूत नौसेना है, पहले अमेरिका के साथ मतभेद में रहे हैं, जिससे अब उन्हें साथ लाना आसान नहीं होगा।

सैन्य स्तर पर भी मुश्किलें

अगर कानूनी और राजनीतिक सहमति मिल भी जाए, तो सैन्य स्तर पर काम और जटिल हो जाता है। गठबंधन में यह तय करना होता है कि किस देश की सेना क्या जिम्मेदारी संभालेगी और किस तरह के नियमों के तहत कार्रवाई होगी। रेड सी मिशन में भी फ्रांस ने अमेरिका के साथ सीधे काम करने की बजाय अलग से अपना अभियान चलाया था।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा गठबंधन बनाना आसान नहीं है और इसमें कई हफ्ते लग सकते हैं। लेकिन अगर गठबंधन बनता है, तो इससे ईरान पर दबाव बढ़ेगा और वैश्विक बाजारों को भी स्थिरता मिल सकती है।

फिलहाल अमेरिकी सेना ईरान की मिसाइल, ड्रोन और नौसेना क्षमता को कमजोर करने में लगी है, ताकि भविष्य में गठबंधन बनाना आसान हो सके।

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