पिछले कुछ दिनों से विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त और सरकार का विरोध करते-करते अब सुप्रीम कोर्ट के भी सामने खड़ा हो गया है। दरअसल, जून, 2025 से मई, 2026 तक सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की हर प्रक्रिया पर सुनवाई के बाद इसे पूरी तरह वैध करार दिया और स्पष्ट संदेश दिया कि मतदाता भी वैध होने चाहिए।
लेकिन विपक्ष लगातार न सिर्फ एसआईआर पर सवाल उठा रहा है, बल्कि उन 13 करोड़ लोगों को जोड़ने की मांग भी कर रहा है जो विभिन्न राज्यों की सूची से या तो बाहर हो चुके हैं या फिर जिन्हें अतिरिक्त दस्तावेज देने को कहा गया है।
राजनीति इतनी तेज है कि यह बात भी नजरअंदाज की जा रही है कि 13 करोड़ लोगों में से लगभग 25 प्रतिशत ही सवालों में हैं। दरअसल, जिन 13.3 करोड़ लोगों की बात हो रही है, उनमें से 2.8 करोड़ लोगों की पिछले दो दशक में मृत्यु हो चुकी है। उन पर एसआईआर के दौरान भी विपक्ष ने अंगुली नहीं उठाई।
एक करोड़ से कुछ अधिक के नाम एक से अधिक स्थानों पर थे, यानी डुप्लीकेट। लगभग 6.5 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं, यानी अपने दर्ज पते पर नहीं रह रहे। पड़ोसियों के अनुसार, वे लोग अरसे से वहां नहीं रह रहे हैं। चुनाव आयोग के अनुसार तीन करोड़ लोग ऐसे थे जो एसआईआर के समय अपने पते पर नहीं थे। ऐसे भी लाखों लोगों को नोटिस मिला जो कई कारणों से पूरे दस्तावेज देने में असमर्थ रहे।
चुनाव आयोग ने कहा है कि 20 राज्यों में ऐसे मतदाताओं की फिर से जांच होगी जिन्हें नोटिस दिया गया था या फिर अंतिम सूची में बाहर किया गया है। लेकिन पूरी कवायद के बीच भी लगभग 25 प्रतिशत लोग ही दायरे में होंगे क्योंकि बाकी पर स्थिति लगभग स्पष्ट है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2026 के फैसले की पहली लाइन में लिखा था कि किसी भी सरकार के लिए मतों की गिनती करने से पहले यह जानना जरूरी है कि किन लोगों के मत गिने जाने चाहिए। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया था कि भारतीय होना जरूरी है और आधार नागरिकता की पहचान नहीं है।
विस्तृत आदेश में कोर्ट ने एसआईआर को लेकर जताई गई एक-एक आशंका का विस्तृत जवाब दिया था। तब लगा था कि एसआईआर को लेकर चल रहे विवाद का पटाक्षेप हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विपक्ष उसी दृढ़ता से अपनी बात पर कायम है और चुनाव आयोग को निशाना बना रहा है।
सवाल उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट प्रक्रिया को सही ठहरा चुका है तो अब उससे बड़ी कौन सी अथारिटी रह गई है जो इस पर दोबारा निर्णय दे। हालांकि एसआईआर की प्रक्रिया से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट अभी भी सुनवाई कर रहा है, लेकिन ये सुनवाइयां एसआईआर की वैधानिकता पर नहीं, बल्कि उसकी प्रणालीगत व्यवस्थाओं पर हैं।
एसआईआर का मामला 24 जून, 2025 को बिहार में एसआईआर कराने की चुनाव आयोग अधिसूचना के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जब विभिन्न याचिकाएं दाखिल कर इसे असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने मसले पर लंबी सुनवाई की, लेकिन प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई, हां कुछ प्रक्रियात्मक निर्देश जारी किए ताकि वह पारदर्शी व जनता के लिए सहज एवं सरल बनी रहे। इस बीच, बंगाल में एसआईआर का मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन उसकी प्रक्रिया पर भी रोक नहीं लगाई।
27 मई के फैसले में कोर्ट ने कहा था कि एसआईआर निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व को साकार करता है। उस फैसले में कोर्ट ने चार प्रश्नों पर विचार किया था कि क्या चुनाव आयोग के पास एसआईआर कराने की शक्ति है। क्या एसआईआर का उद्देश्य वैध है और क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाई प्रक्रिया उस उद्देश्य के अनुपात में है जिसे प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या एसआईआर में आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया आरपी एक्ट और मतदाताओं के पंजीकरण नियम, 1960 के प्रविधानों का उल्लंघन करती है। क्या चुनाव आयोग उन लोगों की नागरिकता जांच सकता है जो मतदाता सूची में बने रहने या शामिल होने का अनुरोध कर रहे हैं।
कोर्ट ने माना कि आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है। प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ और मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिहाज से चुनाव आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है।