त्तर प्रदेश में कक्षा छह से आठ तक यानी अपर प्राइमरी को पढ़ाने वाले अनुदेशक शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी खुशखबरी मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने कांट्रेक्ट पर नियुक्त किए गए सभी अनुदेशक शिक्षकों को 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने कहा है कि 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय का नियम 2017-18 से लागू होगा।
कोर्ट का यह आदेश एक अप्रैल, 2026 से प्रभावी होगा और राज्य सरकार को छह महीने के भीतर बकाया का भी भुगतान करना होगा। हालांकि राज्य सरकार केंद्र सरकार के हिस्से का पैसा भारत सरकार से वसूल सकती है।
17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलेगा
इतना ही नहीं, अनुदेशक शिक्षक कांट्रेक्ट की अवधि पूरी होने के बाद नौकरी में नियमित किए जाएंगे। यानी उनकी नौकरी भी पक्की हो जाएगी।
शीर्ष अदालत ने भारतीय संस्कृति में शिक्षक को भगवान के बराबर माने जाने की बात कहते हुए कहा कि शिक्षक भारत का भाग्य विधाता है।
वह आने वाली पीढि़यों के चरित्र का निर्माण करता है। नागरिकों के चरित्र निर्माण के जरिये राष्ट्र की नींव का निर्माण करता है। अगर यह नींव कमजोर हुई तो राष्ट्र का पतन हो जाएगा।
इसलिए हमें हर स्तर पर शिक्षकों का सबसे ज्यादा सम्मान करना चाहिए। विशेषकर प्राथमिक शिक्षकों का और उन्हें उनके काम का उपयुक्त मानदेय मिलना चाहिए। हालांकि शिक्षक जो सेवा करते हैं, उसके लिए तो कोई भी मानदेय पर्याप्त नहीं है।
2017-18 से बकाया भुगतान छह महीने में होगा
यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका खारिज करते हुए और वेलफेयर एसोसिएशन व टीचर्स की याचिका स्वीकार करते हुए दिया है।
कोर्ट ने आदेश में कहा कि अनुदेशक शिक्षक को 7,000 रुपये प्रतिमाह के फिक्स्ड मानदेय पर नौकरी देना, जैसा शुरू में 2013-14 में तय किया गया था, बेगार और गलत तरीका है जो संविधान के अनुच्छेद-23 का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार एक अप्रैल, 2026 से अनुदेश शिक्षकों को 17,000 रुपये प्रतिमाह की दर से मानदेय देगी। अनुदेशक शिक्षक 2017-18 से 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय पाने के हकदार हैं और राज्य सरकार आदेश के छह महीने के भीतर उन्हें इसी दर से बकाया का भुगतान करेगी।
कोर्ट ने कहा कि पार्ट-टाइम या कांट्रेक्ट पर शुरुआत में 11 महीने के लिए नियुक्त किए गए अनुदेशक शिक्षक असल में अब कांट्रेक्ट वाले नहीं रहे जाते हैं क्योंकि उन्हें विशेष तौर पर अतिरिक्त समय में भी और कोई नौकरी या पार्ट-टाइम काम लेने से मना किया गया है।
कोर्ट ने कहा कि असल में ये अनुदेशक शिक्षक लगातार 10 वर्षों से ज्यादा समय से काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी पदों पर स्थायी रूप में नियुक्त माना जाएगा। क्योंकि समय बीतने के साथ और काम की निरंतरता को देखते हुए ऐसे पद अपने आप सृजित हो जाते हैं।
शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा कि मानदेय देने की शुरुआती जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, लेकिन वह भुगतान करो और वसूल करो (पे एंड रिकवर) के सिद्धांत पर भारत सरकार से केंद्र सरकार के हिस्से का योगदान वसूलने के लिए स्वतंत्र है। कोर्ट ने कहा कि अनुदेशक शिक्षकों का मानदेय स्थिर नहीं रह सकता और इसका हर तीन वर्ष में रिवीजन होना चाहिए।
2013 में हुई थी पार्ट-टाइम नियुक्तियां
उत्तर प्रदेश में सर्वशिक्षा अभियान के तहत पूरे राज्य में अपर प्राइमरी स्कूलों (कक्षा छह से आठ) में कांट्रेक्ट के आधार पर पार्ट-टाइम इंस्ट्रक्टर टीचरों की नियुक्ति का निर्णय लिया गया था। 2013 में इस बावत विज्ञापन निकला, जिसमें 7,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय पर 11 महीनों के लिए नियुक्ति की गई थी।
शर्त थी कि कहीं और पार्ट-टाइम या फुल-टाइम नौकरी नहीं करेंगे। 11 महीने की अवधि पूरी होने के बाद नए सिरे से काम पर रखा जाता था, लेकिन मानदेय नहीं बदला गया।
जबकि संबंधित समिति पीएबी ने 2017 में इसे बढ़ाकर 17,000 रुपये प्रतिमाह करने की मंजूरी दी थी, लेकिन जब पैसा नहीं बढ़ा तो मामला कोर्ट पहुंचा था। इनके मानदेय का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र और 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार देती है।