एआई की मदद से ग्रामीण भारत सशक्त, मौसम पूर्वानुमान से फसलों के नुकसान को किया कम…

दिल्ली में हाल ही में संपन्न एआई समिट में जिस डिजिटल भविष्य पर चर्चा हुई, उसकी सबसे ठोस झलक ग्रामीण भारत में देखी जा सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों और खेतों तक पहुंच चुका है।

पंजाब में एआई आधारित मौसम पूर्वानुमान यंत्र किसानों को समय रहते निर्णय लेने में मदद कर रहा है, जिससे फसलों का नुकसान घट रहा है।

बिहार में सेंसर और कंट्रोल रूम से संचालित स्मार्ट फार्म कम श्रम में अधिक उत्पादन का मॉडल पेश कर रहा है। वहीं, मध्य प्रदेश में किसान एआई तकनीक से गन्ने की फसल कर लाभ उठा रहे हैं।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन का संकेत है, जहां डेटा, नवाचार और आत्मविश्वास मिलकर गांवों को नई दिशा दे रहे हैं।

मौसम पूर्वानुमान से रुका फसलों का नुकसान

मौसम अब सिर्फ आसमान की तरफ देखकर नहीं, बल्कि डेटा और एआई के आधार पर पढ़ा जा रहा है। पंजाब में बठिंडा के रहने वाले बलजिंदर सिंह मान ने अपने घर से शुरू की गई पहल को आज पंजाब के कई जिलों तक पहुंचा दिया है।

उन्होंने एआई आधारित ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन स्थापित किया है, जिसका सीधा असर फसल प्रबंधन, लागत में कमी और संभावित हानि को घटाने के रूप में सामने आ रहा है।

इस तकनीक ने खेती को ‘अनुभव आधारित’ से ‘डेटा आधारित’ दिशा में मोड़ दिया है। नौ साल पहले शुरू हुई इस पहल के पीछे एक दर्दनाक घटना थी। वर्ष 2017 में भुच्चो मंडी के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर घनी धुंध के कारण हुए भीषण हादसे में 10 लोगों की मौत हो गई थी। बलजिंदर सिंह को उस हादसे ने झकझोर दिया।

उनके मन में सवाल उठा कि अगर धुंध की सटीक और समय रहते चेतावनी मिल जाती तो शायद जानें बचाई जा सकती थीं। यहीं से उन्होंने मौसम को गहराई से समझने और तकनीक के जरिये लोगों तक सटीक जानकारी पहुंचाने का संकल्प लिया।

उन्होंने अपने घर पर ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन स्थापित किया और नियमित अपडेट देने शुरू किए। इसके लिए उन्होंने इंटरनेट मीडिया माध्यम फेसबुक व इंस्टाग्राम पर ‘मौसम पंजाब दा’ नाम से पेज बनाया है। धीरे-धीरे पहल विस्तार पाती गई।

अब उनके स्टेशन अमृतसर, गुरदासपुर, श्री मुक्तसर साहिब, रोपड़, लुधियाना, फाजिल्का, पटियाला, जालंधर, होशियारपुर और चंडीगढ़ सहित कई स्थानों पर स्थापित हैं। यह नेटवर्क इस सिद्धांत पर काम कर रहा है कि जितने अधिक स्टेशन, उतना अधिक स्थानीय और सटीक डाटा मिलेगा।

बलजिंदर के अनुसार, किसान की सबसे बड़ी चुनौती अनिश्चित मौसम है। यदि वर्षा, तेज हवा या ओलावृष्टि की पूर्व सूचना मिल जाए तो नुकसान काफी हद तक रोका जा सकता है। उदाहरण के तौर पर किसान फसल पर कीटनाशक का छिड़काव करते हैं।

यदि छिड़काव के कुछ घंटों बाद बारिश हो जाए तो हजारों रुपये का खर्च बेकार चला जाता है। हालांकि, अब 10 से 15 दिन के पूर्वानुमान से किसान पहले ही निर्णय बदल लेते हैं।

रियल टाइम नेटवर्क से मिल रहा फायदा

बलजिंदर सिंह बताते हैं कि उन्होंने शुरुआत में लगभग 60 हजार रुपये खर्च कर फाइलोटेक का वेदर स्टेशन लगाया था। बाद में अमेरिका से कम कीमत पर उपकरण मिलने लगे और अब अन्य जिलों में भी वही स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं। एआई आधारित सिस्टम स्थानीय स्तर पर हवा का दबाव, तापमान, नमी और वर्षा जैसे तत्वों का विश्लेषण आसान हो गया है।

यदि किसी जिले में हवा का दबाव अचानक बढ़ता है तो आसपास के जिलों को तुरंत अलर्ट किया जाता है कि आंधी या वर्षा की संभावना बन रही है। यह रियल टाइम नेटवर्क खेती के साथ-साथ आम जनजीवन के लिए भी उपयोगी साबित हो रहा है।

इस तरह साबित हुआ लाभ

फाजिल्का के किसान बलकौर सिंह बताते हैं कि एक दिन वह ट्यूबवेल चलाकर सिंचाई करने जा रहे थे, तभी मौसम पंजाब दा पेज देखा। उससे पता चला कि दोपहर बाद वर्षा की संभावना है। उन्होंने सिंचाई रोक दी और दोपहर बाद वर्षा हो गई। इससे न सिर्फ इंजन पर तेल के रूप में होने वाली खपत बची, बल्कि अतिरिक्त पानी से फसल को होने वाले नुकसान से भी बचाव हुआ।

एआई तकनीक से गन्ने की खेती कर ले रहे लाभ

मध्य प्रदेश में बड़वानी जिले के पानसेमल के किसान अब गन्ने की खेती में एआई तकनीक अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। करीब 28 किसानों के खेतों में एआई आधारित उपकरण लगाए गए हैं। इस तकनीक के तहत खेत में सोलर संचालित सेंसर लगाया जाता है, जो जमीन में नमी, पानी की मात्रा, खाद और पोषक तत्वों की स्थिति का आकलन करता है।

यह सेंसर लगभग दो से तीन एकड़ क्षेत्र की निगरानी करता है। एकत्रित जानकारी सीधे विशेषज्ञ केंद्र तक पहुंचती है, जहां से किसानों को मोबाइल संदेश के माध्यम से आवश्यक सलाह दी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रणाली से सिंचाई और उर्वरक का सही उपयोग संभव हो रहा। इससे फसल का उत्पादन बढ़ रहा है और लागत घट रही है। इस उपकरण की खरीद योजना में 50 से 75 प्रतिशत तक सरकारी सब्सिडी का प्रविधान है। इसकी लागत डेढ़ से दो लाख रुपये तक आती है, लेकिन अनुदान के बाद किसान को करीब 50 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

किसान दिलीप राव शितोले ने बताया कि इससे समय की बचत होती है और बिना बार-बार जांच के खेत की सटीक जानकारी मिल जाती है। इस पूरे अभियान में दुर्गा खांडसारी शुगर मिल के संचालक नितिन गोयल ने अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने महाराष्ट्र के बारामती स्थित गन्ना विशेषज्ञों से संपर्क कर किसानों को प्रोत्साहित किया है।

स्मार्ट फार्म: कम श्रम में कर रहे अधिक उत्पादन

अपने खेत दिखाते सुधांशु कुमार यह बताना नहीं भूलते कि आधुनिक तकनीक ने खेती को कितना आसान व फायदेमंद बना दिया है। पौधों को कब व कितनी सिंचाई की जरूरत है, कितनी खाद देनी है, सेंसर बेस्ड तकनीक यह तय कर देती है। बिहार में समस्तीपुर जिले के नयानगर गांव में यह तकनीक एक मिसाल है।

इसे देखने दूर-दूर से किसान आते हैं। सुधांशु उन्हें तकनीक व बेहतर खेती के गुर सिखाते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी उनके फार्म में आ चुके हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए पास 62 वर्षीय सुधांशु ने 1990 से खेती की शुरुआत केरल के मुन्नार में टाटा टी गार्डन में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी छोड़कर की थी। शुरुआत महज पांच एकड़ से की। आज करीब 200 एकड़ में खेती कर रहे। केला, आम, लीची, अमरूद, जामुन व ड्रैगन फ्रूट के अलावा मक्का, गेहूं और मसूर सहित अन्य फसलें उगाते हैं।

श्रमिकों की कमी, समय पर उपलब्धता नहीं होने को देखते हुए उन्होंने तकनीक का उपयोग करने की ठानी। सबसे पहले 40 हजार रुपये खर्च कर ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर मशीन लाए। अच्छे रिजल्ट के बाद तकनीक की मदद से खेती का सफर आगे बढ़ने लगा।

कंट्रोल रूम से होती है सिंचाई व कृषि गतिविधियों की निगरानी

एआई आधारित फार्म लैब का कंट्रोल रूम सिंचाई व कृषि गतिविधियों की निगरानी के लिए जंक्शन के रूप में कार्य करता है। सिस्टम को फार्म व उसमें लगे पेड़-पौधों के अनुरूप प्रोग्राम किया गया है। कंट्रोल रूम में स्वाइल सेंसर, इरिगेशन सेंसर, सेल्फ अपलोडिंग वेदर स्टेशन, ऑटोमेटेड इरिगेशन और फर्टिलाइजर सिस्टम लगे हैं।

स्वाइल सेंसर मिट्टी की सेहत, इरिगेशन सेंसर सिंचाई की आवश्यकता की और वेदर स्टेशन मौसम की जानकारी देता है। कंट्रोल रूम में लगे टैंक ड्रिप से खेत में खाद व कीटनाशक पहुंचाते हैं। कंट्रोल रूम से दिया गया इनपुट तय करता है कि पौधों को कब सींचना है। कंट्रोलर मिश्रण तैयार करने के लिए खाद और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा भी चुनता है। इससे 50 प्रतिशत पानी व 30 प्रतिशत खाद की बचत होती है।

ब्राडबैंड से जुड़ा है नेटवर्क

पूरा फार्म ब्राडबैंड से जुड़ा है। सुधांशु दुनिया के किसी भी कोने से स्मार्टफोन या लैपटाप के जरिये निगरानी कर लेते हैं। सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं। सुधांशु बताते हैं कि तकनीक के प्रयोग से केला और आम की फसल में चार गुना वृद्धि हुई है।

पानी व खाद की उतनी ही मात्रा पौधे को मिलती है, जितनी चाहिए। वह भी जड़ तक पहुंचती है। इससे लागत काफी कम आती है। बाग में लगे केले के पत्ते पीले होकर गिर जाते थे। नए केले में आंतरिक सड़न भी पैदा करते थे। अब सेंसर बता देता है कि मिट्टी में फंगस लग गया है। इसके बाद उपचार किया जाता है।

इन्होंने भी आय बढ़ाई

हसनपुर के किसान विदुर झा व डॉ. प्रभात कुमार कहते हैं कि सुधांशु से प्रेरणा लेकर उन्होंने भी खेती में तकनीक के इस्तेमाल से आय बढ़ाई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के विज्ञानी डॉ. एसके सिंह बताते हैं कि जब किसान को यह पता चल जाए कि आज का मौसम कैसा रहेगा, पौधे को किसी चीज की कमी है, किस पौधे को किस खाद की आवश्यकता है तो स्वाभाविक रूप से फसल अच्छी होगी। यह सबकुछ सुधांशु के फार्म हाउस में है।

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