अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष पूरा हो गया है और यह उनका ही असर है कि आज दुनिया बेहद असुरक्षित और अस्थिर है। ट्रंप की नजर में दोस्तों और सहयोगियों की कोई अहमियत नहीं है। अगर वह कुछ चाहते हैं तो उनके लिए यह बिजनेस है।
वह इसके लिए दोस्ती, लंबी अवधि के रणनीतिक हित और भरोसे, हर चीज को दांव पर लगाने को तैयार हैं। वह दो नेताओं के बीच हुई निजी बातचीत भी सार्वजनिक कर सकते हैं। कुल मिला कर ट्रंप हर वह चीज कर सकते हैं, जो राजनयिक शिष्टाचार के दायरे में नहीं आती है।
ट्रंप ट्रैप में नहीं फंसा भारत
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी काफी पहले ही उनके अप्रत्याशित तौर तरीकों और निहित खतरों को काफी पहले ही भांप गए थे, जिसे यूरोप के नेता अब समझ रहे हैं। आइये सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं कि मोदी ने ‘ट्रंप ट्रैप’ से बचते हुए भारत के हितों को कैसे सुरक्षित रखा।
आपरेशन सिंदूर पर ट्रंप का दावा 11 मई, 2025 को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम कराया है और इसके लिए व्यापार न करने की धमकी का इस्तेमाल किया।
पाकिस्तान ने तुरंत ट्रंप का समर्थन किया और नोबेल पुरस्कार के लिए उनके नाम की सिफारिश भी कर दी। वहीं, भारत ने साफ किया कि युद्धविराम की अपील पाकिस्तान की ओर से स्थापित चैनल के जरिये की गई थी और भारत ने इस पर सहमति जताई।
हालांकि, भारत ने ऐसा करते हुए संयम बरता और सीधे ट्रंप पर हमला करने से परहेज किया। मोदी का जवाब और ट्रंप का टैरिफ हमला 17 जून को ट्रंप और मोदी के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत ने तनाव बढ़ा दिया।
भारी टैरिफ के बावजूद भारत ने धैर्य बनाए रखा
मोदी ने स्पष्ट रूप से ट्रंप से कहा कि युद्धविराम में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने नोबल शांति पुरस्कार के लिए भी ट्रंप की सिफारिश करने से इनकार कर दिया।
वहीं पाकिस्तान इस मसले पर ट्रंप की चापलूसी पर उतर आया। इसके नतीजे भी जल्द ही आए और ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिए। वहीं, पाकिस्तान पर सिर्फ 19 प्रतिशत टैरिफ लगा।
भारत ने धैर्य को बनाया हथियार 50 प्रतिशत भारी भरकम टैरिफ के बाद भी भारत ने कोई जल्दबाजी दिखाए बिना धैर्य को हथियार बनाया।
मोदी के साथ ही उनके मंत्रियों ने भी ट्रंप टैरिफ वार पर जवाबी हमला नहीं किया। वहीं, अमेरिकी नेता भारत के खिलाफ कभी रूस से तेल खरीद को लेकर यह दूसरे मसलों पर बयानबाजी करते रहे। वहीं, दूसरी तरफ ट्रंप बीच बीच में लगातार मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें सच्चा दोस्त बताते रहे।
टैरिफ के दबाव और अमेरिकी नेताओं की धमकियों के बावजूद, भारत ने अमेरिका की शर्तो पर व्यापार समझौता करने में जल्बाजी नहीं दिखाई, जिसमें अमेरिका उस पर कृषि एवं डेयरी सेक्टर खोलने के लिए दबाव डाल रहा है। इसके साथ ही भारत ने रूसी तेल का आयात भी नहीं रोका।
ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ अहम व्यापार समझौते
इस बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अमेरिकी प्रशासन के साथ राजनयिक और व्यापार से जुड़ी चर्चाओं को आगे बढ़ाते रहे। मोदी ने दिखाया भारत के पास हैं और भी विकल्प ऐसा भी नहीं है कि भारत अमेरिका के दबाव में आ गया हो।
पीएम मोदी ने एससीओ सम्मेलन के लिए चीन की यात्रा करके और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी कार में यात्रा करके ट्रंप को साफ संकेत दिया कि उसके बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों से इतर दूसरे रणनीतिक विकल्प भी हैं।
यह भारत की उस दशकों पुरानी विदेश नीति का टूल था, जो किसी खेमे से न बंधने पर आधारित रही है।
अहम व्यापार समझौतों को दिया गया अंतिम रूप इसी दौरान भारत ने ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ अहम व्यापार समझौते किए। यूरोपीय संघ के साथ मदर आफ डील जल्द होने वाली है।
इस बीच भारत ने चुपचाप अमेरिकी दालों पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। भारत ने ऐसा बिना सीना ठोंके किया।
ऐसा करने से अमेरिका चिढ़ सकता था। ट्रंप को नहीं दिया गुमराह करने का मौका भारत ने एक और अहम सबक सीखा कि ट्रंप को तथ्यों को तोड़- मरोड़ कर नरेटिव सेट करने का मौका नहीं देना है। 17 जून की फोन काल के बाद ट्रंप ने मोदी को चार बार फोन किया लेकिन मोदी काल पर नहीं आए।
अन्य देशों से संबंध मजबूत कर रणनीतिक विकल्प
अमेरिका भारत के साथ मिनी ट्रेड डील चाहता था लेकिन मोदी को पता था कि ट्रंप बातचीत को कैसे तोड़ मरोड़ कर अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं। बाद में अमेरिका के एक मंत्री ने बताया कि कैसे मोदी ने ट्रंप को फोन नहीं किया और दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता नहीं हो पाया।
17 सितंबर को जब मोदी के जन्मदिन पर ट्रंप और मोदी के बीच बातचीत हुई तो यह सुनिश्चित किया गया कि भारत का वर्जन पहले दुनिया के सामने आए। यहां ट्रंप को कोई कहानी बनाने का मौका नहीं मिला।
तो सार्वजनिक बेइज्जती से बच जाते मैक्रों अगर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पीएम मोदी का अनुसरण किया होता तो वह उस सार्वजनिक वेइज्जती से बच जाते, जो ट्रंप ने उनके निजी मैसेज सार्वजनिक करके की है।
यूरोप को भी अब यह बात समझ आ गई होगी कि ट्रंप के साथ वफादारी सम्मान की गारंटी नहीं है। पाकिस्तान ट्रंप की हर तरह की चापलूसी करके भी वीजा पर रोक से बच नहीं पाया।