शांति समझौता नाकाम, अमेरिका-इजरायल और ईरान फिर लौट सकते हैं हथियारों की राह पर-भारत पर क्या पड़ेगा असर?…

जिसका डर था वही हुआ। शांति समझौते लिए अमेरिका और ईरान के वार्ताकारों के बीच 21 घंटे की बातचीत बेनतीजा रही। इससे दोनों पक्षों के बीच हुए दो सप्ताह के युद्धविराम के भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है। यह भविष्य की गर्त में है कि अब अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में शांति के लिए बातचीत की मेज पर वापस लौटेंगे या फैसला अब

हथियारों से ही होगा। पश्चिम एशिया में संघर्ष क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक मुद्दा है। इसके राजनीतिक और आर्थिक असर की जद में पूरी आधी दुनिया है। अगर संघर्ष नए सिरे से शुरू होता है। तो इसके बहुत व्यापक और गंभीर नतीजे हो सकते हैं। ऐसे में पड़ताल का विषय यह है कि युद्धविराम समझौता पश्चिम एशिया में शांति पाएगा या जल्द ही टूट जाएगा…

मानवीय क्षति (हताहतों की संख्या)

इस युद्ध में सबसे अधिक जनहानि ईरान और लेबनान में हुई है, जबकि मिसाइल हमलों के कारण फारस की खाड़ी के लगभग हर देश में नागरिक प्रभावित हुए हैं।

600 अरब डालर खर्च होंगे पश्चिम एशिया में पुनर्निर्माण पर

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच एक माह से अधिक समय तक चले युद्ध ने पश्चिम एशिया के देशों को मानवीय, सैन्य और आर्थिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया है। इस युद्ध की वजह से दुनिया के कई देशों में ऊर्जा का संकट पैदा हो गया और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े संकट में फंसने की आशंका पैदा हो गई थी। आइये जानते हैं नुकसान का ब्यौरा …

युद्ध हताहतों का विवरण

देश / समूहमौतों की संख्या (अनुमानित)विवरण
ईरान3,600 – 7,600 +इसमें सैन्य कर्मियों के साथ-साथ 1,000 से अधिक नागरिक शामिल हैं
लेबनान1,800+युद्ध के दौरान 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए
इजरायल4013 सैनिक और 27 नागरिक मारे गए, 7,400 से अधिक घायल
अमेरिका15मुख्य रूप से सैन्य कर्मी; बेस हमलों में सैकड़ों घायल
खाड़ी देश (कुल)50यूएई, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब और ओमान में मौतें दर्ज की गईं

जंग में आर्थिक और बुनियादी ढांचे का नुकसान

इस युद्ध में रणनीतिक रूप से बिजली ग्रिड और पानी के संयंत्रों को निशाना बनाया गया।

ईरान: प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान 145 अरब डालर ( करीब 12 लाख करोड़ रुपये) से अधिक होने का अनुमान है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र और लगभग 150 नौसैनिक जहाजों को भारी क्षति पहुंची है।

खाड़ी देश : अरब देशों को 120 अरब डालर से अधिक का नुकसान हुआ। ईरानी नेजवाब में दुबई, अबू धाबी और कुवैत के अंतरराष्ट्रीय हवाई और पानी के संयंत्रों को निशाना बनाया गया।

अमेरिका: पेंटागन के अनुसार, पहले महीने में सैन्य खर्च 18 अरब डॉलर रहा, जबकि भविष्य के अभियानों के लिए 200 अरब डॉलर की अतिरिक्त मांग की गई।

पुनर्निर्माण: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का अनुमान है कि पूरे क्षेत्र को दोबारा खड़ा करने मैं अगले 15 वर्षों में 600 अरब डालर का खर्च आएगा ।

वैश्विक प्रभाव: इस युद्ध ने 1970 के दशक के बाद से अब तक का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट पैदा कर दिया है।

तेल कीमतों में भारी उछाल : युद्ध शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई।

कीमतों का शिखर: मार्च 2026 के मध्य में ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई थी। युद्ध से पहले यह लगभग 75-80 डॉलर के आस-पास थी।

अस्थिरता: केवल एक सप्ताह के भीतर कीमतों में 25 प्रतिशत की वृद्धि देखि गई, जो 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद की सबसे बड़ी वृद्धि थी।

होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी

ईरान ने जवाबी कार्रवाई के रूप में इस संकरे समुद्री रास्ते को आंशिक रूप से बाधित कर दिया था।

आपूर्ति रुकना: प्रतिदिन लगभग 15 मिलियन बैरल तेल की आवाजाही रुक गई। इससे सऊदी अरब, इराक, युएई और कुवैत से होने वाला निर्यात पूरी तरह ठप हो गया था।

बीमा लागत: युद्ध क्षेत्र से गुजरने वाले तेल टैंकरों के लिए समुद्री बीमा प्रीमियम में 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

बुनियादी ढांचे को नुकसान

ईरान का तेल क्षेत्र: अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों ने ईरान के खार्ग द्वीप तेल टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचाया, जो ईरान के 90 प्रतिशत तेल निर्यात का केंद्र है।

खाड़ी देशों पर हमले: ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब और यूएई के कुछ रिफाइनरी और पाइपलाइन केंद्रों को निशाना बनाया, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता में अस्थायी रूप से 15-20 प्रतिशत की गिरावट आई।

रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग

तेल कीमतों को नियंत्रित करने के लिए दुनियाभर की सरकारों को कदम उठाने पड़े :

आइईए की कार्रवाई: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ( आइईए) के सदस्यों ने अपने आपातकालीन भंडार से लाखों बैरल तेल बाजार में जारी किया।

अमेरिका का कदम: अमेरिका ने अपने रणनीतिक भंडार से तेल निकाला, लेकिन भंडार पहले से ही कम होने के कारण इसका असर सीमित रहा।

भारत पर असर

भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से करता है। कीमतों में इस उछाल से भारत का चालू खाता घाटा बढ़ गया है। सरकार को खुदरा पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क घटाना पड़ा है।

खाद्य सुरक्षा को खतरा

आपूर्ति श्रृंखला: दुनिया के उर्वरक निर्यात का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा रुक गया है, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

ग्लोबल जीडीपी: मुद्रास्फीति के कारण 2026 के लिए ग्लोबल जीडीपी की वृद्धि दर का अनुमान 33 प्रतिशत से घटाकर 3.0 प्रतिशत कर दिया गया है।

महंगाई की मार

परिवहन महंगा होने के कारण दुनिया भर में खाद्य और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ गई हैं।

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