पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच युद्धविराम बढ़ाए जाने के बाद भी पाक अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया और उसने पत्तिका प्रांत के अर्घोन और बरमल जिलों में एयरस्ट्राइक कर दी।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच दोहा में वार्ता होने वाली है। हालांकि पाकिस्तान की हरकतें बता रही हैं कि वह शांति नहीं चाहता है। इसके अलावा उसे अफगानिस्तान के विजयी इतिहास और संघर्ष की भी जानकारी नहीं है।
अफगानिस्तान वह देश है जहां से विश्व की तमाम ताकतें मुंहकी खाकर लौट गईं। अफगानिस्तान जब कबीलों में बंटा था तब भी महाशक्तियां उससे डरती थीं।
भारत से 28 साल पहले मिली अंग्रेजों से आजादी
अफगानिस्तान की धरती पर कई देशों की ध्वजा-पताकाएं गिर गईं। इसीलिए इसे ‘साम्राज्यों के कब्रिस्तान के तौर पर जाना जाता है।’
अगर केवल 20वीं शताब्दी की बात करें तो 1919 में ही यानी भारत की आजादी से 28 साल पहले ही अंग्रेजों ने अफगानिस्तान को छोड़ दिया था।
1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया लेकिन वे 10 साल में भी युद्ध जीत नहीं पाए। अफगानिस्तान पर आक्रमण के बाद सोवियत संघ की ताकत कम होने लगी और वह बिखरने लगा।
2001 में अमेरिका की अगुआई में अफगानिस्तान पर हमला हुआ। यह युद्ध वर्षों तक चलता रहा। लाखों लोगों की मौत हुई।
इसके बाद 2021 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपनी सेना को वापस बुला लिया और तालिबान का शासन एक बार फिर अफगानिस्तान पर स्थापित हो गया।
अफगानिस्तान का इतिहास ऐसा ही रहा है। यहां आने वाली सेनाओं को शुरू में भले ही लगा हो कि वह सफळ हो रही हैं लेकिन अंत यही था कि उन्हें बड़ा नुकसान उठाने के बाद यहां से भागना पड़ गया।
क्यों विदेशी ताकतों का कब्रगाह बना अफगानिस्तान
अफगानिस्तान में कोई एक संगठित सरकार नहीं थी। यहां कबीले थे। वहीं विकास का नामो-निशान ना होने की वजह से यहां का जीवन काफी कठिन था।
विदेशी सेनाओं के लिए यहां सर्वाइव करना भी बड़ी चुनौती थी। इतिहास पर नजर डालें तो सिकंदर, मंगोलों औऱ ईरानियों ने अफगानिस्तान पर विजय हासिल की थी।
ब्रिटेन ने तीन बार खाई मात
1839 से लेकर 1919 के बीच ब्रिटेन ने अफागानिस्तान पर तीन हमले किए। यह सब रूस को जवाब देने के लिए हो रहा था। पहली बार ब्रिटेन ने इसीलिए काबुल पर हमला किया क्योंकि उसे डर था कि कहीं रूस का कब्जा काबुल पर हो जाए।
हालांकि अफगानी कबीलों ने ही ब्रिटेन की सेना को छका दिया। कहा जाता है कि ब्रिटेन के 16 हजार सैनिक जलालाबाद के लिए रवाना हुए थे जिनमें से केवल एक वापस लौट पाया।
1878 केबाद ब्रिटेन ने अफगानिस्तान पर फिर आक्रमण किया। वहीं 1919 में अमीर ने खुद को स्वतंत्र घोषित किया और तीसरी बार ब्रिटेन के साथ संघर्ष शुरू हुआ। उस समय बोल्शेविक क्रांति की वजह से रूस से खतरा कम हो गया था।
वहीं पहले विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की भी आर्थिक हालत पतली थी। ऐसे में वह चार महीने ही युदध लड़ा और फिर अफगानिस्तान स्वतंत्र हो गया।
1979 में जब रूस ने हमला किया तो लगभग 15 लाख लोग मारे गए। लेकिन ग्रामीण इलाकों में मुजाहिदीन संगठन संघर्ष कर रहे थे। मुजाहिदीनों को चीन, ईरान, सऊदी अरब और अमेरिका से मदद मिलने लगी।
रूस की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी तो युद्ध रोका गया। 1988 में सोवियत संघ ने अपने सैनिकों को वापस बुलाया। इसे रूस की शर्मनाक हार करार दिया गया।