विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए समता विनियमन (इक्विटी रेगुलेशन) के जिन पहलुओं को लेकर सवर्ण समाज विरोध कर रहा है और दुरुपयोग की आशंकाएं जता रहा है, दरअसल उन पहलुओं को लेकर इसके मूल मसौदे में पूरी सतर्कता दिखाई गई थी।
नए विनियमन में जातिगत भेदवाद की जिस परिभाषा में एससी,एससी के साथ ओबीसी को भी शामिल किया है, वह मसौदे में शामिल नहीं था। मसौदे में सिर्फ एससी और एसटी को ही शामिल किया गया था।
इतना ही नहीं, विनियमन के जिस दुरुपयोग को लेकर आशंका जताई जा रही है, उससे निपटने के लिए भी मसौदे में एक अलग से बिंदु जोड़ा गया था।
सवर्ण समाज यूजीसी के समता विनियमन का विरोध कर रहा
सूत्रों का कहना है कि मूल मसौदे में कुछ सुझावों के आधार पर बदलाव किए गए थे। कुछ सुझाव आए थे कि का्रवाई की बात कहे जाने पर लोग डर जाते हैं। लेकिन ऐसे सुझावों पर पूरी तरह इसे क्यो हटाया गया यह स्पष्ट नहीं है।
यह भी स्पष्ट नहीं है कि मसौदे पर मिले सुझाव के बाद हटाने या जोड़ने की जो कवायद हुई उसपर उस कमिटि से कोई राय ली गई या नहीं जिसने मूल मसौदा बनाया था।
उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नए समता विनियमन ( इक्विटी रेगुलेशन) बनाने के लिए यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आठ सदस्यों की एक कमेटी गठित की थी। जिसकी अध्यक्षता भावनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. शैलेष जाला कर रहे थे।
ओबीसी को जातिगत भेदभाव परिभाषा में शामिल करने पर आपत्ति
यूजीसी ने नए समता विनियम के जिन बिंदु तीन (सी) में अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी) को शामिल किए जाने को लेकर सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है, वह शब्द मसौदे में नहीं था।
मसौदे में सिर्फ एससी-एसटी को ही रखा गया था। इसके साथ ही इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए मसौदे में एक बिंदु 10 शामिल किया गया था, जिसमें यह व्यवस्था दी गई थी, यदि कोई झूठी शिकायत करेगा तो उसके खिलाफ संस्थान भारी जुर्माना लगाएंगे।
गौरतलब है कि मसौदा फरवरी 2025 में जारी किया गया था, जबकि अंतिम विनियमन को 13 जनवरी 2026 को जारी किया गया था।