देश में सिर्फ एक-तिहाई बच्चे ही एरोबिक फिटनेस मानकों पर खरे उतरे, विशेषज्ञों ने जताई चिंता…

देशभर के 112 शहरों के 333 स्कूलों में 1.4 लाख से ज्यादा बच्चों पर किए गए सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबित, केवल 34 प्रतिशत भारतीय स्कूली बच्चे ही एरोबिक फिटनेस के मानकों पर खरे उतर पाए। यह सभी फिटनेस संकेतकों में सबसे कमजोर प्रदर्शन है।

ये नतीजे कमजोर कार्डियोवैस्कुलर सहनशक्ति, कमजोर मांसपेशियों की ताकत और अलग-अलग तरह के स्कूलों के बीच असमानताओं को उजागर करते हैं, जबकि Covid-19 बाद फिटनेस का कुल स्तर धीरे-धीरे सुधर रहा है।

ये रिपोर्ट एक मिली-जुली तस्वीर पेश करती है। जहां लचीलापन और ताकत के नतीजे काफी अच्छे हैं, वहीं फिटनेस का कुल प्रोफाइल अभी भी असमान बना हुआ है।

एरोबिक क्षमता से कमी सबसे ज्यादा चिंताजनक

एरोबिक क्षमता सबसे ज्यादा चिंताजनक कमजोरी है, जिसमें सिर्फ 34% बच्चे ही स्वस्थ मानकों को पूरा करते हैं। यह कम कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस और शारीरिक गतिविधि को लगातार बनाए रखने की सीमित क्षमता को दर्शाता है।

देश में सिर्फ एक-तिहाई बच्चे ही एरोबिक फिटनेस मानकों पर खरे उतरे, विशेषज्ञों ने जताई चिंता

बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. संजय बोरुडे ने कहा, “एरोबिक क्षमताओं में बच्चों के पीछे रहने का मुख्य कारण बढ़ता मोटापा है, जो हर दिन और आम होता जा रहा है।”

सहनशक्ति के अलावा, ऊपरी और निचले शरीर की ताकत सभी उम्र के समूहों और क्षेत्रों में लगातार कमजोर बनी हुई है। निचले शरीर की ताकत विशेष रूप से चिंता का विषय है, जो संतुलन, गतिशीलता और कुल शारीरिक स्थिति से जुड़ी समस्याओं का संकेत देती है।

शारीरिक व्यायाम दिनचर्या का जरूरी हिस्सा होना चहिए

सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल में पुनर्वास और खेल चिकित्सा के निदेशक डॉ. आशीष कॉन्ट्रैक्टर ने इन रुझानों को पर्यावरणीय और व्यवहारिक कारकों से जोड़ा। उन्होंने कहा, “बचपन के दौरान, शारीरिक गतिविधि की क्षमता सबसे ज्यादा होती है, लेकिन आज सबसे बड़ी बाधाओं में से एक खुली जगहों और खेल सुविधाओं तक पहुंच की कमी है।”

उन्होंने कहा कि पारिवारिक और संस्थागत, दोनों ही स्तरों पर, शारीरिक व्यायाम को बाद में सोचने वाली चीज के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह बच्चे की रोजमर्रा की दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा होना चाहिए।

इसके विपरीत, लचीलापन (70%) और ताकत (87%) के नतीजे बेहतर हैं, जिससे पता चलता है कि फिटनेस के कुछ पहलुओं को बनाए रखा जा रहा है। ये नतीजे स्पोर्ट्स विलेज द्वारा जारी 14वें वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण का हिस्सा हैं।

सरकारी स्कूल के छात्रों का बेहतर प्रदर्शन

सरकारी स्कूलों के छात्र फिटनेस के सात में से पांच मानकों में निजी स्कूलों के छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं। यह अंतर एरोबिक और एनारोबिक क्षमता जैसे सहनशक्ति के मानकों में सबसे ज्यादा साफ दिखता है, जिससे पता चलता है कि सरकारी स्कूलों के बच्चों में रोजाना शारीरिक गतिविधि ज्यादा होती है। इसका संबंध शायद आजादी से खेलने और घूमने-फिरने के ज्यादा मौकों से हो सकता है।

हालांकि, दोनों ही तरह के स्कूलों में निचले शरीर की ताकत कमजोर बनी हुई है, जो ढांचागत कमियों का संकेत है। खान-पान भी इसमें एक भूमिका निभा सकता है। डॉ. बोरुडे ने कहा, “ताकत की कमी का एक और कारण प्रोटीन का पर्याप्त मात्रा में न मिलना है। खान-पान, खासकर शाकाहारी खान-पान, हमेशा मांसपेशियों के विकास के लिए जरूरी प्रोटीन नहीं दे पाता।”

लिंग के आधार पर भी दिखता है अंतर

लड़के एरोबिक क्षमता और शरीर के निचले हिस्से की ताकत में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जिससे उनकी सहनशक्ति ज्यादा होने का पता चलता है। लड़कियों में BMI का स्तर ज्यादा स्वस्थ और लचीलापन बेहतर होता है, जो बेहतर शारीरिक बनावट और जोड़ों की गतिशीलता का संकेत है। इन अंतरों के बावजूद, दोनों ही समूहों में एरोबिक फिटनेस की कमी एक आम समस्या है।

क्षेत्रीय स्तर पर भी दिखता है अंतर

क्षेत्रीय स्तर पर, पश्चिमी भारत ज्यादातर संकेतकों में सबसे अच्छा प्रदर्शन करता है, जो उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों से आगे है। हालांकि, किसी भी क्षेत्र में ज्यादातर बच्चे सहनशक्ति के तय मानकों को पूरा नहीं कर पाते हैं, जिससे यह पता चलता है कि यह समस्या पूरे देश में कितनी बड़ी है। यह रिपोर्ट महामारी के कारण फिटनेस के स्तर में आई भारी गिरावट को भी दिखाती है।

जीवनशैली में तुरंत बदलाव लाने पर जोर देते हुए, डॉ. कॉन्ट्रैक्टर ने अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन बहुत कम करने और स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय को नियंत्रित और नियमित करने की सलाह दी है।

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