सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार, 6 फरवरी को युवती की प्रजनन स्वतंत्रता को अजन्मे बच्चे के अधिकार से ज्यादा जरूरी बताया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ‘अगर कोई युवती प्रेगनेंसी कंप्लीट नहीं करना चाहती है, तो कोर्ट उसे मजबूर नहीं कर सकता’।
जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि युवती को 30 हफ्तों की प्रेगनेंसी के बाद बच्चे को जन्म देना होगा। इसके बाद अगर वह बच्चा नहीं रखना चाहती तो वो उसे गोद दे सकती है।
30 हफ्ते की प्रेगनेंसी खत्म करने की दी इजाजत
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनाए अपने फैसले में युवती को 30 हफ्ते की प्रेगनेंसी खत्म करने की इजाजत दे दी। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी युवती को उसकी मर्जी के खिलाफ प्रेगनेंसी जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
नाबालिग लड़की 17 साल की उम्र में प्रेग्नेंट हुई थी और अब वह 18 साल और चार महीने की है। अब उसकी प्रेगनेंसी 30 हफ्ते की हो गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चा एक दोस्त के साथ रिश्ते से हुआ था और प्रेगनेंसी जारी रखना लड़की के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से दर्दनाक होगा।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट की जांच करने के बाद पाया कि अगर प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत दी जाती है तो लड़की को कोई गंभीर खतरा नहीं होगा।
युवती के हक में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘जिस बात पर विचार करना है, वह आखिरकार नाबालिग बच्ची का प्रेगनेंसी जारी रखने का अधिकार है, जो साफ तौर पर अवैध है क्योंकि वह नाबालिग है और उसे अपने रिश्ते की वजह से इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।’
कोर्ट ने साफ तौर पर कहा, ‘मुद्दा यह नहीं है कि रिश्ता सहमति से बना था या नहीं। आखिरकार, बात यह है कि बच्चा अवैध है और मां बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती।’
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, ‘मां की प्रजनन स्वतंत्रता पर जोर दिया जाना चाहिए। अगर कोई युवती प्रेगनेंसी पूरी नहीं करना चाहती है तो कोर्ट उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।’