बिहार में किसके पक्ष में झुकेगा 36 का आंकड़ा? अब तक नीतीश कुमार को मिल रहा है समर्थन…

बिहार विधानसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही समीकरणों पर बातें तेज हो गई हैं। कौन किसके साथ जाएगा और कौन किसके खिलाफ मतदान करेगा, इस पर चर्चाएं तेज हैं और हर खेमा अपने साथ बड़े वोटबैंक को लाने की कोशिश में है।

कभी राज्य में 18 फीसदी मुसलमानों की बात होती है तो वहीं 14 फीसदी यादव समुदाय भी एक बड़ा वोटबैंक है। लेकिन आरजेडी 2005 के बाद से ही अपने दम पर यदि सत्ता में नहीं आ पा रही है तो इसकी वजह है कि वह यादव और मुसलमान समीकरण से आगे नहीं बढ़ पाई है।

इसका कारण यह रहा है कि 18+14 वाले इस वोट को साधने के बाद वह अधिकतम 32 फीसदी वोट सुनिश्चित कर लेती है। इसमें भी कुछ वोट कटता जरूर है।

वहीं नीतीश कुमार और भाजपा के पास गैर-यादव ओबीसी छिटकता रहा है। यही नहीं नीतीश कुमार ने जब इस ओबीसी में भी विभाजन करके ईबीसी वर्ग तैयार किया तो वह उनकी रणनीति और कारगर हो गई।

यादव और मुस्लिम प्रभुत्व के विपरीत अति पिछड़ा वर्ग का मतदाता उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। इसी वर्ग का एक हिस्सा भाजपा के साथ है और सवर्ण तो एकजुटता के साथ भगवा खेमे को वोट करता रहा है।

अहम बात यह है कि यह ईबीसी वर्ग आरजेडी के MY समीकरण से अधिक है और एकमुश्त है। आंकड़ों के अनुसार राज्य में EBC वोटर्स की संख्या 36 फीसदी है। यह संख्या राज्य का सबसे बड़ा वोटर ब्लॉक बनाती है, जिस पर नीतीश कुमार काबिज रहे हैं।

इस वर्ग में कुल 112 जातियां आती हैं। ओबीसी और अनुसूचित जाति वर्ग के बीच में आने वाले इस समुदाय की इतिहास में राजनीतिक पकड़ और पहचान कमजोर रही है।

ऐसे में यादवों की छत्रछाया से अलग जब नीतीश कुमार ने कुर्मी, कोइरी, कुशवाहा और अन्य ईबीसी की गोलबंदी की तो यह वर्ग मुखर हुआ है। इसी वर्ग में कुछ मुस्लिम जातियां भी आती हैं और यदि उन्हें हटा भी दें तो नंबर 26 फीसदी हो जाता है।

नीतीश कुमार ने इस वर्ग के लिए पंचायतों में आरक्षण दिया है। इसके अलावा सीट बंटवारे में भी ख्याल रखते हैं। इसलिए माना जा रहा है कि भाजपा का सवर्ण, नीतीश का ईबीसी, चिराग पासवान का दलित और जीतनराम मांझी का महादलित वोट मिलकर एनडीए को बड़ी ताकत दे सकता है।

हालांकि इसमें एक्स फैक्टर प्रशांत किशोर होंगे। हर किसी की यह जानने में दिलचस्पी रहेगी कि किस वर्ग का कितना वोट किसे मिलता है।

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