NCLT की सुस्ती से दिवालिया कानून के सुधार पड़े बेअसर, आर्थिक सर्वेक्षण में कड़ी आलोचना…

बैंकों की ऋण वसूली की प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से बनाए गए दिवालिया कानून (आईबीसी) दिवाला निश्चित तौर पर एक बड़ा सुधारवादी कदम है लेकिन राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में लंबित मामलों की भारी संख्या और फैसलों में देरी इसकी प्रभावशीलता को कमजोर कर रही है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कहा गया है कि मार्च, 2025 तक एनसीएलटी में करीब 30,600 मामले लंबित हैं और मौजूदा निपटारे की दर से इन्हें साफ करने में लगभग 10 साल लग सकते हैं।

इस तरह की देरी से ‘संपत्तियों का मूल्य घटता है, कर्मचारी कंपनी छोड़ देते हैं, ग्राहक प्रतिस्पर्धियों की ओर रुख करते हैं और आपूर्तिकर्ताओं के साथ संबंध टूट जाते हैं।’

वैसे केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष इसकी खामियों को दूर करने के लिए आइबीसी में नया संशोधन किया, लेकिन उससे हालात कितने सुधरेंगे, इसको लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है।सर्वेक्षण में एनसीएलटी के मौजूदा ढांचे की खामियों पर जोर दिया गया है।

NCLT में 30,600 मामले लंबित, निपटारे में 10 साल संभव

इसमें कहा गया है कि संस्थागत बाधाएं न केवल अदालतों में बल्कि रिजाल्यूशन प्रोफेशनल्स (आरपी) के स्तर पर भी मौजूद हैं। पूरे देश में आइबीसी और कंपनी एक्ट के मामलों को संभालने के लिए केवल 30 एनसीएलटी बेंच हैं, जबकि 4,527 पंजीकृत आरपी में से केवल 2,198 (करीब 49 प्रतिशत) ही सक्रिय असाइनमेंट के लिए अधिकृत हैं।

आरपी एनसीएलटी की तरफ से नियुक्त पेशेवर होते हैं जिन पर दिवालिया कानून के तहत कंपनी को बंद करने या उसकी हिस्सेदारी व परिसंपत्तियों को बेचने व दायित्वों के निपटान की जिम्मेदारी होती है।

आइबीसी के तहत कार्पोरेट इनसाल्वेंसी रिजाल्यूशन प्रोसेस (सीआइआरपी) को 330 दिनों में पूरा करने का प्रविधान है, लेकिन औसतन यह 713 दिनों तक खिंच जाता है।

औसत दिवालिया समाधान समय 713 दिन, लक्ष्य 330 दिन

वित्त वर्ष 2025 में बंद हुए मामलों में औसत 853 दिनों का रहा, जो वैधानिक सीमा से 150 प्रतिशत अधिक है। एनसीएलटी की इस सुस्ती का आइबीसी सुधारों पर गहरा असर पड़ रहा है।

इससे न केवल आर्थिक मूल्य का विकास होता है, बल्कि बैकिंग सेक्टर की सेहत भी प्रभावित होती है क्योंकि लंबित मामले उत्पादक पूंजी को फ्रीज कर देते हैं। इससे बैंकों की कर्ज देने की क्षमता भी प्रभावित है।

2021 में छोटे उद्यमों के लिए शुरू की गई प्री-पैकेज्ड इनसाल्वेंसी रिजाल्यूशन प्रोसेस (पीपीआइआरपी) को सरल, तेज व कम लागत वाली प्रक्रिया के रूप में पेश किया गया था, लेकिन चार सालों में इसमें केवल 14 प्रवेश हुए हैं।

सर्वेक्षण में इसके कम उपयोग की वजहें बताई गई हैं जैसे-प्रक्रिया की जटिलता, एमएसएमई सेक्टर के लोगों में इसके लिए जागरुकता की कमी, छोटे उद्यमों की फंडिंग की असमर्थता आदि।

इन चुनौतियों को देखते हुए, आइबीसी संशोधन विधेयक 2025 में कई उपाय प्रस्तावित हैं। इसमें प्रक्रियागत देरियों को दूर करने के लिए कदम उठाए गए हैं, जैसे प्रवेश के लिए सख्त समय-सीमाएं (14 दिनों में आवेदनों का निपटारा), ग्रुप इनसाल्वेंसी और क्रास-बार्डर इनसाल्वेंसी के लिए फ्रेमवर्क।

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