मिडिल ईस्ट युद्ध: शिया-सुन्नी तनाव हुआ तेज, ईरान ने खाड़ी देशों को क्यों लपेटे में लिया?…

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध का आज 30वां दिन है। ये युद्ध केवल इन तीन देशों तक ही सीमित नहीं रह गया, बल्कि इन युद्ध की आग ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया।

वेस्ट एशिया में छिड़े इस युद्ध की कहानी जो सामने से दिखाई दे रही है, उसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही है। यह समझने के लिए कि ईरान ने खाड़ी क्षेत्र पर हमला करने का फैसला क्यों किया, इसके लिए युद्ध के तात्कालिक कारणों से परे देखना होगा और उस साये पर नजर डालनी होगी जो लंबे समय से पश्चिम एशिया पर मंडरा रहा है।

मिडिल ईस्ट में भड़क रही शिया-सुन्नी की आग

मिडिल ईस्ट में छिड़े युद्ध की सच्चाई शिया और सुन्नी इस्लाम के बीच का बंटवारा है। इस बात का जिक्र समय-समय पर कई बार हुआ है। यह सिर्फ धार्मिक दुश्मनी की कोई सीधी-सादी कहानी नहीं है, बल्कि यह सत्ता, वैधता, प्रभाव और अस्तित्व की कहानी है।

शिया-सुन्नी बंटवारे की जड़ें 632 ईस्वी तक जाती हैं। पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु के बाद एक ऐसा सवाल सामने आया जिसने इस्लामी इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।

समुदाय का नेतृत्व कौन करेगा?

पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु के बाद जब नेतृत्व संभालने की बात आई, तब एक गुट का मानना था कि नेतृत्व आम सहमति से चुना जाना चाहिए। इन लोगों ने अबू बक्र का समर्थन किया।

दूसरे गुट का मानना था कि सत्ता पैगंबर के परिवार के पास ही रहनी चाहिए। इन लोगों ने अली का समर्थन किया। उत्तराधिकार को लेकर शुरू हुआ यह राजनीतिक मतभेद धीरे-धीरे धार्मिक सत्ता और पहचान के मामले में एक बड़े बंटवारे में बदल गया।

समय के साथ दोनों गुटों के बीच ये मतभेद और भी गहरे होते गए। सुन्नियों ने सामूहिक नेतृत्व और विद्वानों द्वारा की गई व्याख्याओं पर जोर देना शुरू कर दिया। वहीं, शिया मुसलमानों ने ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त इमामों की अवधारणा को समर्थन दिया।

शिया और सुन्नी के बीच सदियों तक ये मतभेद कभी सीधे टकराव में नहीं बदले। दोनों समुदाय एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहते थे, आपस में बातचीत करते थे और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

1979 की क्रांति में गहरी हुई दरार

ईरान में 1979 में इस्लामी क्रांति हुई। ईरान ने अपने राजतंत्र को उखाड़ फेंका और धर्मगुरुओं के नेतृत्व में एक ‘इस्लामी गणराज्य’ की स्थापना की। ईरान की इस इस्लामिक क्रांति ने सिर्फ अपने देश की राजनीतिक व्यवस्था ही नहीं बदली, बल्कि इस पूरे क्षेत्र में एक नई वैचारिक शक्ति का बीज बो दिया।

तेहरान ने खुद को सीमाओं के पार बसे शिया समुदायों की आवाज बनने का भी दावा किया। इससे सुन्नी बहुल देशों खासकर सऊदी अरब में खलबली मच गई, क्योंकि सऊदी अरब खुद को सुन्नी दुनिया का अगुआ और इस्लामी परंपराओं का संरक्षक मानता था।

ईरान और सऊदी अरब के बीच का यह संघर्ष जल्द ही पश्चिम एशिया की राजनीति का सबसे अहम पहलू बन गया। यह प्रतिद्वंद्विता सीधे टकराव के रूप में नहीं, बल्कि इराक, सीरिया और यमन जैसे देशों में ‘छद्म युद्धों’ के जरिए सामने आई।

2003 में इराक में अमेरिकी हमले के बाद सद्दाम हुसैन की सत्ता गिरने से, सत्ता की बागडोर उन शिया गुटों के हाथों में चली गई जिनके तार ईरान से जुड़े हुए थे।

सीरिया में, तेहरान ने बशर अल-असद का समर्थन किया, जबकि सुन्नी-बहुल देशों ने विपक्षी गुटों का साथ दिया। यमन में, हौथियों के उभार ने इस प्रतिद्वंद्विता में एक और परत जोड़ दी। हर संघर्ष ने अविश्वास को गहरा किया और इसी के साथ दोनों समुदायों के बीच दरार और गहरी होती चली गई।

खाड़ी देशों में इन सभी विवादों के बीच भी सीधे तौर पर कभी हमले नहीं हुए, लेकिन व सीमा पार हो चुकी है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त ऑपरेशन में अली खामेनेई की हत्या के बाद, ईरान ने हाल के हफ्तों में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों की ओर हजारों मिसाइलें दागी हैं। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *