Inside Story: आखिर क्यों अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला पड़ता दिख रहा है ईरान? रूस और चीन भी खुलकर समर्थन देने से क्यों बच रहे हैं…

ईरान-इजरायल युद्ध आज छठे  दिन में प्रवेश कर चुका है। इस जंग में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई।

खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर जबरदस्त जवाबी हमले किए, मिसाइल और ड्रोन से हमला कर क्षेत्र में भारी अफरा-तफरी मचा दी है।

इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि ईरान के मजबूत कूटनीतिक सहयोगी चीन और रूस ने सैन्य मदद क्यों नहीं दी? दोनों देशों ने युद्ध की निंदा की और खामेनेई की मौत को अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन बताया।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसे ‘मानव नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय नियमों का निंदनीय उल्लंघन’ करार दिया। वहीं, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इजयातली समकक्ष से कहा कि ताकत से समस्याओं का हल नहीं होता, बल्कि नई समस्याएं पैदा होती हैं और गंभीर परिणाम सामने आते हैं।

रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की, कड़ी निंदा और कूटनीतिक कदम उठाए, लेकिन ईरान के समर्थन में कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की। इससे लगता है कि दोनों महाशक्तियां सीधे युद्ध में शामिल होने से बच रही हैं, शायद बड़े संघर्ष या आर्थिक प्रभाव से डरकर।

रूस नहीं चाहता एक और युद्ध

रूस पहले से ही यूक्रेन के साथ लंबे समय से संघर्ष में है और मिडिल ईस्ट में एक और युद्ध में नहीं पड़ना चाहता। दिलचस्प बात यह है कि रूस और ईरान ने पिछले साल जनवरी में एक स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप ट्रीटी पर साइन किया था। इस पैक्ट ने इंटेलिजेंस और डिफेंस कोऑर्डिनेशन को मजबूत किया, लेकिन इसमें कोई म्यूचुअल डिफेंस क्लॉज शामिल नहीं था।

इसलिए, रूस जवाब देने के लिए मजबूर नहीं है क्योंकि यह एग्रीमेंट एक फॉर्मल मिलिट्री अलायंस से थोड़ा कम है। रशियन इंटरनेशनल अफेयर्स काउंसिल के पूर्व डायरेक्टर जनरल और रशियन फॉरेन पॉलिसी थिंक टैंक वल्दाई डिस्कशन क्लब के मेंबर एंड्री कोर्तुनोव ने अल जजीरा को बताया कि नॉर्थ कोरिया के साथ रूस की 2024 की ट्रीटी मिलिट्री सपोर्ट पर ‘ज्यादा बाइंडिंग एग्रीमेंट का उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि उस एग्रीमेंट के तहत, रूस नॉर्थ कोरिया के किसी भी संघर्ष में शामिल होने के लिए मजबूर होगा। लेकिन ईरान के मामले में, इसमें बस यह बताया गया है कि दोनों पक्ष किसी भी दुश्मनी वाली कार्रवाई से दूर रहने पर सहमत हुए हैं, अगर दूसरा पक्ष संघर्ष में शामिल होता है। कोर्तुनोव ने आगे कहा कि रूस यूक्रेन के साथ युद्द्ध में अमेरिका की मध्यस्थता को प्राथमिकता दे रहा है। क्रेमलिन ने एक बयान में कहा है कि रूस को ईरान से मदद के लिए कोई रिक्वेस्ट नहीं मिली है।

चीन ने क्यों नहीं दिया साथ?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान का एक और पुराना साथी चीन, अमेरिका का सामना करके हितों को खतरे में डालने नहीं चाहता है। चीन की सिंघुआ यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड स्ट्रैटेजी में पोस्टडॉक्टरल फेलो जोडी वेन ने अल जजीरा को बताया, ‘पॉलिटिकल साइड से, हमारे बीच रेगुलर लेन-देन होता है।

इकोनॉमिक साइड से, सहयोग बहुत गहरा है; कई कंपनियों ने ईरान में इन्वेस्ट किया है। लेकिन उन्होंने कहा कि चीन ने पार्टनरशिप की साफ सीमाएं तय कर दी हैं। चीनी सरकार हमेशा दूसरे देशों के मामलों में दखल न देने का पालन करती है… मुझे नहीं लगता कि चीनी सरकार ईरान को हथियार भेजेगी।’

खास बात यह है कि मिडिल ईस्ट में युद्ध चीनी हितों को खतरे में डालता है। ईरान की धमकियों ने होर्मुज स्ट्रेट से ट्रैफिक को असल में रोक दिया है, जो अरब सागर तक फारस की खाड़ी का एकमात्र रास्ता है। दूसरी एशियाई इकॉनमी के अलावा, चीन मिडिल ईस्ट से तेल इंपोर्ट करता है, और इस ब्लॉकेड से उसकी सप्लाई पर असर पड़ेगा। राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनके अमेरिकी समकक्ष डोनल्ड ट्रंप के बीच आने वाली समिट भी है।

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