अमेरिकी व्हिस्की और वाइन पर आयात शुल्क (ड्यूटी) में संभावित रियायत से भारतीय शराब कंपनियों पर कोई बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि आयात की मात्रा बहुत कम है और यह छूट भी न्यूनतम आयात मूल्य जैसी शर्तों के साथ आएगी।
क्यों नहीं पड़ेगा बड़ा असर?
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी व्हिस्की पर ड्यूटी में छूट न्यूनतम आयात मूल्य के साथ दी जाएगी, जैसा पहले ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और ब्रिटेन के साथ हुए व्यापार समझौतों में किया गया था।
इसके अलावा, भारत में अमेरिकी व्हिस्की की बिक्री बहुत कम है। कुल 2,29,000 केस की बिक्री के साथ इसका बाजार हिस्सेदारी 0.1% से भी कम है।
भारत का व्हिस्की बाजार मुख्य रूप से घरेलू कंपनियों के कब्जे में है। इसकी तुलना में स्कॉच व्हिस्की की हिस्सेदारी 3% से अधिक और आयरिश व्हिस्की की हिस्सेदारी 0.2% से कम है।
बोर्बन क्यों नहीं बन पाएगी बड़ी चुनौती?
ब्रेवर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक विनोद गिरी के मुताबिक, ज्यादातर बोर्बन और टेनेसी व्हिस्की का रंग गहरा होता है और स्वाद ज्यादा तेज होता है।
उन्होंने कहा कि ये व्हिस्की, सिंगल माल्ट की तरह खास स्वाद पसंद करने वाले उपभोक्ताओं को आकर्षित करती हैं न कि आम प्रीमियम व्हिस्की ग्राहकों को।
उनका कहना है कि कीमत बड़ी बाधा नहीं है। इसका उदाहरण भारत में बोतलबंद जिम बीम है, जो सस्ती होने के बावजूद खास प्रदर्शन नहीं कर पाई है। इसलिए बोर्बन पर ड्यूटी घटने से प्रीमियम व्हिस्की बाजार पर कोई बड़ा असर नहीं होगा।
सरकार का रुख
शराब उद्योग इस व्यापार समझौते के विस्तृत ब्योरे का इंतजार कर रहा है। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि घरेलू कंपनियों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा।
कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनियों (CIABC) के महानिदेशक अनंत एस. अय्यर ने कहा कि संगठन आयात शुल्क घटाने के खिलाफ नहीं है, लेकिन यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से होनी चाहिए।
वाइन की बात करें तो इसका हिस्सा भारतीय शराब बाजार में 0.5% से भी कम है। इसमें भी ऑस्ट्रेलियाई वाइन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है।
भारत में आयातित वाइन की सफलता सिर्फ उसके देश या ब्रांड पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मजबूत वितरण व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी होती है। इसलिए वाइन पर ड्यूटी में संभावित रियायत से भी बाजार में कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है।