‘सुप्रीम’ झटके के बाद भी टैरिफ का दांव चल सकते हैं Donald Trump – अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कौन-कौन से विकल्प?…

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के वैश्विक आयात शुल्क को खारिज किए जाने के बावजूद उनके पास टैरिफ को आक्रामक रूप से जारी रखने के कई कानूनी विकल्प मौजूद हैं।

अदालत ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनामिक पावर्स एक्ट (आइईईपीए) के तहत राष्ट्रपति के व्यापक अधिकारों के दावे को स्वीकार नहीं किया।

ट्रंप ने इसी कानून के आधार पर पिछले वर्ष लगभग सभी देशों पर दोहरे अंकों के पारस्परिक शुल्क लगाए थे और लंबे समय से चले आ रहे व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातस्थिति बताया था। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के फैसले से टैरिफ नीति पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।

ट्रंप के टैरिफ दावे को सुप्रीम कोर्ट ने नकारा

जार्जटाउन यूनिवर्सिटी की व्यापार कानून विशेषज्ञ कैथलीन क्लासेन के अनुसार, अन्य वैधानिक प्रविधानों के जरिए मौजूदा टैरिफ ढांचे को फिर से खड़ा किया जा सकता है। 

सेक्शन 301 का हथियार ट्रंप के पास विकल्पों में 1974 के ट्रेड एक्ट का सेक्शन 301 प्रमुख है, जो अमेरिका को अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यापार प्रथाओं में शामिल देशों पर शुल्क लगाने की अनुमति देता है।

ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में चीन के खिलाफ इसी प्रविधान का व्यापक इस्तेमाल किया था। हालांकि इसके तहत टैरिफ लगाने से पहले जांच और आमतौर पर सार्वजनिक सुनवाई जरूरी होती है, लेकिन शुल्क की दर पर कोई स्पष्ट सीमा नहीं है और इन्हें चार वर्ष बाद बढ़ाया भी जा सकता है।

ट्रंप के पास सेक्शन 122 का भी विकल्प

इसी कानून का सेक्शन 122 राष्ट्रपति को असंतुलित व्यापार के जवाब में अधिकतम 150 दिनों के लिए 15 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है।

इसके लिए पूर्व जांच की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि अब तक इस प्रविधान का उपयोग नहीं किया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार भी प्रशासन के लिए एक रास्ता बना हुआ है।

1962 के ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट का सेक्शन 232 राष्ट्रपति को उन आयातों पर शुल्क लगाने की अनुमति देता है जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाए।

ट्रंप ने 2018 में इसी के तहत स्टील और एल्युमीनियम पर टैरिफ लगाए थे और बाद में आटो, आटो पा‌र्ट्स तथा अन्य उत्पादों पर भी इसका विस्तार किया।

इस प्रविधान में शुल्क की सीमा तय नहीं है, लेकिन वाणिज्य विभाग की जांच अनिवार्य होती है। इसके अलावा 1930 के टैरिफ एक्ट का सेक्शन 338 भी एक संभावित विकल्प माना जा रहा है।

महामंदी के दौर में बने इस कानून के तहत राष्ट्रपति उन देशों पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगा सकते हैं जो अमेरिकी कंपनियों के साथ भेदभाव करते हैं।

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