5 अगस्त आपको भले ही रोज जैसा ही लगे, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक इस दिन पृथ्वी ने इतिहास रच दिया।
5 तारिक यानि बीते कल धरती ने अपनी धुरी पर पूरा चक्कर लगभग 1.34 मिलीसेकेंड जल्दी पूरा कर लिया, यानी यह दिन अब तक के सबसे छोटे दिनों में शामिल हो सकता है।
हालांकि ये वक्त इतना छोटा है कि आम लोग इसे महसूस भी नहीं कर सकते, न आपकी सुबह की चाय छूटी, न ही दफ्तर पहुंचने में कोई फर्क आया।
लेकिन वैज्ञानिक इस बदलाव को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं, क्योंकि इसका असर GPS से लेकर शेयर बाजारों के टाइमस्टैम्प तक पड़ सकता है – वो सभी सिस्टम जो अत्यंत सटीक टाइमिंग पर काम करते हैं।
क्यों बढ़ रही पृथ्वी की रफ्तार?
पृथ्वी हमेशा एक निश्चित स्पीड से नहीं घूमती। दिन का औसत समय तो 24 घंटे (86,400 सेकंड) माना जाता है, लेकिन इसकी स्पीड कई वजहों से बदलती रहती है। सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है पृथ्वी का आंतरिक कोर, यानी अंदर का ठोस लोहा-निकेल से बना गोला।
नई रिसर्च के मुताबिक यह कोर अपनी गति धीमी कर रहा है और संतुलन बनाए रखने के लिए बाकी पृथ्वी यानी मेंटल और क्रस्ट की गति बढ़ रही है। इसे ऐसे समझें जैसे स्केटिंग करने वाला खिलाड़ी अपने हाथ अंदर करके तेजी से घूमने लगता है।
पृथ्वी की स्पीड बढ़ने से क्या असर?
पृथ्वी की घूमने की रफ्तार में मामूली बदलाव कई प्राकृतिक कारणों से हो सकता है, जैसे ऊपरी वातावरण की तेज हवाएं, समुद्री धाराएं, समुद्र का जल स्तर बदलना, या ग्लेशियरों का पिघलना।
यहां तक कि बड़े भूकंप जैसे 2011 में जापान में आया शक्तिशाली भूकंप भी पृथ्वी के अंदरूनी भार को इधर-उधर कर सकते हैं, जिससे उसकी घूर्णन गति में हल्का सा फर्क आ सकता है।
क्या छोटे दिन अब सामान्य बात
छोटे दिन अब सामान्य हो चले हैं, ऐसा कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। लंबे समय के पैमाने पर देखा जाए तो पृथ्वी की घूमने की रफ्तार धीरे-धीरे कम हो रही है, कभी अरबों साल पहले एक दिन सिर्फ 6 घंटे का हुआ करता था।
लेकिन हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि पृथ्वी कभी-कभी कुछ समय के लिए तेज़ भी घूमने लगती है, जिससे दिन के सेकेंड हिस्से भर छोटे हो सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, साल 2020 में 28 सबसे छोटे दिन रिकॉर्ड किए गए थे। अब तक का सबसे छोटा दिन 5 जुलाई 2024 को आया, जो सामान्य से 1.66 मिलीसेकेंड छोटा था।
इसके बाद 10 जुलाई 2025 को दिन 1.37 मिलीसेकेंड छोटा रहा, और अब 5 अगस्त 2025 भी इस सूची में शामिल हो गया है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये बदलाव सैटेलाइट्स, इंटरनेट, शेयर बाजार, GPS और ट्रांजैक्शन सिस्टम्स को प्रभावित कर सकते हैं। टाइम में मामूली गड़बड़ी भी कई बड़ी सेवाओं को गड़बड़ा सकती है।