दफ्तर की थकान और दिल्ली के ट्रैफिक से जूझते हुए मैं ऑटो से घर लौट रही थी। प्रेम नगर के पास अचानक नजर बाहर की ओर गई। लोहे की कड़ाहियां, औजार, सिलबट्टे और मटके सजाए कुछ झोपड़ियां।
मन में ख्याल आया, चलो आज ‘सिलबट्टा’ ले ही लेते हैं, मिक्सी के जमाने में हाथ का स्वाद भी चख लेंगे।
ऑटो से उतरी तो मंजर कुछ और ही था। दूर तक झोपड़ियों का अंतहीन सिलसिला, जैसे दिल्ली के दिल में एक छोटा सा ‘कस्बा’ बसा हो। तभी दाईं ओर से आवाज आई, “हां मेरी बेटी… क्या लेना है?”
सामने 50-60 साल की एक अम्मा थीं। चेहरे पर झुर्रियों से ज्यादा वक्त का तजुर्बा था। मैंने पूछा, ‘अम्मा, आप यहां कब से हैं?’ जवाब मिला, “बहुत साल हो गए बेटा, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से आए थे, तब से यही बर्तन और पत्थर बेचकर गुजारा कर रहे हैं।’
अम्मा से बात करते हुए मेरी नजर 4-5 झोपड़ी दूर दो युवतियों पर पड़ी। चूल्हे पर हांडी चढ़ी थी और सोंधी सी खुशबू हवा में तैर रही थी। मैं उनकी तरफ बढ़ी, “दीदी… कैसी हो?”
हंसकर बोलीं, ‘हम एकदम मस्त हैं!’
बातों-बातों में पता चला कि वे राजस्थान से नहीं, रायबरेली (उत्तरप्रदेश) से हैं और सालों से दिल्ली में उनका परिवार दिहाड़ी मजदूरी कर रहा है। मैंने उनकी आंखों में झांकने की कोशिश की, जहां सपनों की जगह बस जिम्मेदारी की ‘धूल’ जमी थी।
मैंने पूछा, ‘शादी कब हुई?’ 25 साल की रेशमा (सांकेतिक नाम) ने बड़े इत्मीनान से कहा, ‘2016 में।’
मेरा दिमाग चकरा गया! 2026 चल रहा है, उम्र 25 है, यानी 2016 में वह महज 15 साल की रही होगी! जिस उम्र में लड़कियां इंस्टाग्राम फिल्टर और स्कूल के प्रोजेक्ट्स में उलझी होती हैं, रेशमा के गले में मंगलसूत्र और हाथों में चूल्हे की कालिख थमा दी गई थी। उसकी 22 साल की देवरानी का हाल तो और भी ‘एडवांस्ड’ था, उसकी शादी महज 14 साल की उम्र में ही कर दी गई थी।
वहां 4-5 साल के बच्चे धूल में खेल रहे थे। मैंने पूछा, ‘इन्हें स्कूल क्यों नहीं भेजतीं?’
जवाब वही पुराना और घिसा-पिटा, ‘सरकार हमारे लिए कुछ नहीं करती। न आईडी कार्ड है, न ठिकाना। आज यहां, कल वहां।’
पीढ़ियों का ‘डेथ वारंट’
जब मैंने उनसे पूछा कि आप खुद क्यों नहीं कमातीं, तो उन्होंने मासूमियत से एक ऐसा फैक्ट बताया जो हमारे ‘डिजिटल इंडिया’ के मुंह पर तमाचा था, ‘दीदी, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। न कोई हुनर है, न कागज। और हमारे यहां औरतें बाहर काम नहीं करतीं, बस घर संभालती हैं।’
कलेजा मुंह को आ गया। ‘पढ़े-लिखे नहीं हैं’??? यह सिर्फ एक जुमला नहीं, एक पूरी पीढ़ी का ‘डेथ वारंट’ है। शिक्षा के बिना बाल विवाह वहां एक ‘रिवाज’ नहीं, बल्कि ‘सर्वाइवल’ का तरीका बन गया है। वे लड़कियां जो खुद अभी ठीक से बड़ी नहीं हुई थीं, अब माएं बनकर अपनी अगली पीढ़ी को भी उसी अनपढ़ अंधेरे की ओर धकेल रही थीं।
वहां से लौटते हुए मेरे एक हाथ में भारी सिलबट्टा था और दूसरे में 5G वाला स्मार्टफोन। विडंबना देखिए… दिल्ली टियर-1 शहर है जहां पिज्जा 10 मिनट में आ जाता है, लेकिन इन झोपड़ियों की दरारों से ‘शिक्षा’ का सूरज अंदर झांकने में आज भी दशकों पीछे है।
सिलबट्टा तो घर आ गया, पर ये सवाल आज भी मन में वैसे ही खड़ा है, क्या इन बस्तियों के नसीब में सिर्फ लोहा कूटना ही लिखा है, या कभी इनके हाथों में स्कूल की कलम का भी नंबर आएगा?
उस रात सिलबट्टे पर पहली बार हरी मिर्च और लहसुन पीसते हुए उसकी खुरदरी आवाज कानों में गूंज रही थी, ठक… ठक… ठक… हर चोट जैसे एक सवाल बनकर उभर रही थी। क्या सच में ‘सरकार कुछ नहीं करती’, या इन लोगों तक उसकी आहट पहुंच ही नहीं पाती?
रेशमा कभी स्कूल गई ही नहीं। न पहली कक्षा, न मिड-डे मील की घंटी, न कॉपी पर अपना नाम लिखने का अभ्यास। बचपन सीधे जिम्मेदारियों में बदल गया। जब मैंने उससे पूछा, ‘पढ़ना चाहती थीं?’ वह हल्की मुस्कान के साथ बोली, ‘हमारे यहां लड़कियां पढ़ती नहीं… जल्दी शादी हो जाती है।’