पितृत्व निर्धारण के मामले में छत्तीसगढ़ में बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की बेंच ने स्पष्ट किया कि विवाह कायम रहते हुए अन्य पुरुष से जन्मे बच्चे कानूनन पहले पति की ही संतान माने जाएंगे, भले ही उक्त अन्य पुरुष उन बच्चों को अपनी संतान स्वीकार करे और महिला के साथ लिव-इन में रहे।
दो महिलाओं ने खुद को बिलासपुर के एक प्रतिष्ठित कारोबारी की बेटियां बताते हुए उन्हें वैध संतान घोषित करने की मांग फैमिली कोर्ट में की थी। ऐसा उन्होंने कारोबारी की संपत्ति में हक पाने के लिए किया था।
फैमिली कोर्ट में दायर याचिका में बताया कि उनकी मां का 1971 में कारोबारी के साथ वरमाला विवाह हुआ था, जिसके बाद उनका जन्म हुआ।
बेटियों ने कहा कि उनकी मां का पहला पति 1984 में घर छोड़कर चला गया और तब से उनका कोई पता नहीं है।
उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि मां के दूसरे पति और कारोबारी पिता ने उन्हें हमेशा बेटियों की तरह माना और स्वीकार किया। कारोबारी ने भी अदालत में इस बात को स्वीकार किया था, लेकिन कारोबारी के स्वजन ने इस निर्णय के विरोध में थे। कोर्ट ट्रायल के बीच व्यापारी का निधन हो गया था।
कानूनी प्रविधानों को नकारा नहीं जा सकता
फैमिली कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दूसरे पति द्वारा संतान के रूप में स्वीकारोक्ति के बयान से कानूनी व्यवस्थाओं और प्रविधानों को नकारा नहीं जा सकता।
लिव-इन के दौरान अन्य पुरुष से बच्चे के जन्म को साबित करने के लिए नॉन-एक्सेस यानी पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध न बनने की बात को चिकित्सकीय प्रमाण के साथ पेश नहीं किया जा सका और न ही पिता की मृत्यु का कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया।
इससे स्पष्ट हुआ कि विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ था। ऐसे में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा पांच और 11 के तहत दूसरा विवाह शून्य माना जाएगा।
फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए युगल पीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को कायम रखा।