प्रियंका प्रसाद (ज्योतिष सलाहकार): केवल व्हाट्सएप मेसेज 94064 20131
छठ की उत्पत्ति के संबंध में 13वीं शती के बाद से कई शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध हैं।
छठ से कई देवी-देवताओं का जुड़ाव है। इस संबंध में बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के पूर्व सदस्य और महावीर मंदिर से जुड़े पं.भवनाथ झा ने अपने ब्लॉग पर विस्तार से लिखा है।
उन्होंने बताया कि छठ पर्व में भगवान् सूर्य की उपासना के साथ स्कन्द की माता षष्ठिका देवी एवं स्कन्द की पत्नी देवसेना की पूजा होती है।
इसी दिन कुमार कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने थे। इसलिए भगवान् सूर्य के साथ-साथ इन सभी देव-देवियों के नाम इस पर्व के साथ जुड़े हैं। समय के साथ इस पर्व का स्वरूप बहुत बड़ा हो गया। ग्रन्थों में छठ को स्कन्दषष्ठी और विवस्वत-षष्ठी कहा गया है।
माघ में भगवान भास्कर का रूप ‘वरुण’ होता है। फाल्गुन में इनका रूप ‘सूर्य’, चैत्र में ‘अंशुमाली’, वैशाख में ‘धाता’, ज्येष्ठ में ‘इन्द्र्र’, आषाढ़ एवं श्रावण मास में ‘रवि’, भाद्र में ‘भग’, आश्विन में ‘पर्जन्य’, कार्तिक में ‘त्वष्टा’, अग्रहण में ‘मित्र’, पौष में ‘विष्णु’ के रूप में भगवान् सूर्य की पूजा की जाती है।
इस प्रकार भगवान् सूर्य की उपासना के साथ सप्तमी तिथि का संबंध रहा है। हेमाद्रि के अनुसार वर्ष भर के सप्तमी व्रतों में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्तिक शुक्ल सप्तमी को माना गया है।
वर्तमान छठ का प्रारंभिक रुप हमें यहां मिलता है।
मिथिला के धर्मशास्त्री ने किया है उल्लेख
मिथिला के धर्मशास्त्री चंडेश्वर ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन भगवान् कार्तिकेय तथा सप्तमी के दिन भगवान् भास्कर को अर्घ्य व पूजा के विधान का उल्लेख किया है।
यहां सप्तमी की पूजा का विधान करते हुए उन्होंने भविष्य-पुराण को उद्धृत किया है कि पंचमी तिथि को एकभुक्त करें (यानी एकबार ही भोजन करें), षष्ठी को निराहार रहें तथा सप्तमी को भगवान् भास्कर की पूजा करें।
विवस्त षष्ठी पर्व भी छठ का रूप
1300 ईं के आसपास भी इस व्रत की परम्परा थी। कार्तिक शुक्ल षष्ठी एवं सप्तमी तिथि को पारस्परिक रूप से विवस्वत् षष्ठी का पर्व मनाया जाता है।
इसमें प्रधान रूप से संज्ञा सहित सूर्य की पूजा है। पौराणिक परम्परा में संज्ञा को सूर्य की पत्नी कहा गया है। रुद्रधर (15वीं शती) के अनुसार इस पर्व की कथा स्कन्दपुराण से ली गयी है। इस कथा में दु:ख एवं रोग नाश के लिए सूर्य का व्रत करने का उल्लेख किया गया है।
माह के सप्तमी तिथि को सूर्योपासना
हेमाद्रि (13वीं शती) ने अपने ग्रन्थ चतुर्वर्ग-चिन्तामणि में प्रत्येक मास की सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य की उपासना का वर्णन किया है। उनकी महिमा का वर्णन अलग-अलग पुराणों के वचनों के द्वारा प्रतिपादित किया है। हेमाद्रि के अनुसार प्रत्येक मास में भगवान् सूर्य के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है।
कसार नैवेद्य के निर्माण की विधि : छठ व्रत में विशेष प्रकार के प्रसाद का भी उल्लेख प्राचीन काल से प्राप्त है। इसमें एक विशेष प्रकार का प्रसाद बनाया जाता है।
इसे ‘कसार’ कहते हैं। यह दूसरे पर्व में नहीं बनाया जाता है। लक्ष्मीधर (12वीं शती) के ‘कृत्यकल्पतरु’ में इसका उल्लेख सूर्य के लिए नैवेद्य के रूप में किया है।
उन्होंने लिखा है कि गेहूं के आटे को घी में भूनकर ईख के रस में पका कर ‘कासार’ बनाया जाता है। ईख के रस के बदले यदि मिसरी का प्रयोग किया जाए तो वह ‘सितासार’ कहलाता है। लोक-संस्कृति में यह आज भी सुरक्षित है।