बांग्लादेश चुनाव परिणाम: जमात का समीकरण कहां बिगड़ा? रहमान के हाथ लगी सत्ता की बागडोर, जानें हार-जीत की पूरी कहानी…

बांग्लादेश के आम चुनाव से पहले तक कट्टरपंथी छवि वाली जमात-ए-इस्लामी जिस आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी थी, नतीजों ने उस दावे की धार कुंद कर दी।

पिछले डेढ़ साल में सड़कों पर सक्रियता और संगठनात्मक ऊर्जा के बल पर पार्टी को अपने सबसे मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद थी, लेकिन मतदान के बाद तस्वीर उलट गई।

जैसे ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बढ़त का दावा किया और विदेशी सरकारों से बधाइयों का दौर शुरू हुआ, जमात ने परिणाम प्रक्रिया की ‘विश्वसनीयता’ पर सवाल उठाते हुए असंतोष जताया। चुनावी गणित बताता है कि शुरुआती बढ़त धीरे-धीरे हाथ से फिसलती चली गई।

जमात की उम्मीदें टूटीं

299 सीटों में से जिन क्षेत्रों में मतगणना के शुरुआती रुझान आए, वहां बीएनपी-नीत गठबंधन लगभग 125 सीटों पर आगे दिखा, जबकि जमात-समर्थित खेमे की बढ़त करीब 50 सीटों तक सिमट गई।

अंतिम आधिकारिक आंकड़े आने से पहले ही यह स्पष्ट हो गया कि सत्ता का ताज जमात की पहुंच से दूर है।कट्टरपंथी विचारधारा खारिज विश्लेषकों के अनुसार, पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती वोटरों के सामाजिक-जनसांख्यिकीय बदलाव को पढ़ने में चूक रही।

युवा, महिला, अल्पसंख्यक को नहीं लुभा पाई जमात

जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद सड़कों पर जमात की उपस्थिति मजबूत दिखी थी और आवामी लीग के चुनावी मैदान से बाहर होने से राजनीतिक स्पेस भी खुला था।

इसके बावजूद युवा मतदाता, जिन्होंने आंदोलन को धार दी थी, निर्णायक संख्या में बीएनपी की ओर झुक गए। महिलाओं का समर्थन भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा और हिंदू सहित अल्पसंख्यक समुदायों ने अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प के तौर पर बीएनपी को तरजीह दी।

दिलचस्प यह भी रहा कि आवामी लीग के वे समर्थक, जिन्होंने मतदान में हिस्सा लिया, जमात के बजाय बीएनपी खेमे में समा गए।

पाकिस्तान से नजदीकी बनी हार का कारण?

पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकी भी गले नहीं उतरी अभियान के आखिरी चरण में विदेशी कूटनीतिक संपर्कों की चर्चा ने भी नैरेटिव बदला। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई रिपोर्टों ने संकेत दिया कि कुछ पश्चिमी राजनयिक जमात के साथ संवाद बढ़ा रहे हैं।

बीएनपी नेताओं ने इसे ‘गुप्त समझ’ का रूप देकर चुनावी सभाओं में मुद्दा बनाया और इसे संप्रभुता व स्थिरता से जोड़ दिया। जमात ने किसी औपचारिक सौदे से इनकार करते हुए विदेशी दूतों से मुलाकातों को ‘सामान्य कूटनीतिक संवाद’ बताया, पर तब तक संदेश का असर वोटरों तक पहुंच चुका था।

पाकिस्तानी नेताओं के साथ जमात की नजदीकी को भी मतदाताओं ने खारिज किया। कैडर की कमजोरी भी खटकी मतदान के अगले दिन जमात ने आधिकारिक परिणामों से पहले ही प्रक्रिया पर असंतोष जताया और “धैर्य रखने” की अपील की, मगर राजनीतिक गति बीएनपी के पक्ष में दिखी।

नतीजों ने यह भी संकेत दिया कि सड़कों की सक्रियता और संगठनात्मक नेटवर्क पर्याप्त नहीं होते, जब तक व्यापक सामाजिक गठबंधन न बने। इस चुनाव ने जमात के लिए स्पष्ट संदेश छोड़ा है—वैचारिक ²ढ़ता के साथ-साथ युवा, महिला और अल्पसंख्यक मतदाताओं का भरोसा जीतने की रणनीति के बिना राष्ट्रीय सत्ता का रास्ता कठिन ही रहेगा।

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