अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा जंग न सिर्फ खाड़ी देशों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है, बल्कि पाकिस्तान को भी एक ऐसी कूटनीतिक और सैन्य दुविधा में खड़ा कर दिया है, जहां से पीछे हटना नामुमकिन नजर आ रहा है।
दरअसल, पाकिस्तान दक्षिण-पश्चिम में ईरान के साथ 900 किलोमीटर की सीमा साझा करता है। ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए जा रहे मिसाइल अटैक के बीच पाकिस्तान के लिए अपनी ‘संतुलनकारी नीति’ को बचाए रखना अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
सऊदी अरब के सामने क्यों मजबूर है पाकिस्तान?
इसके पीछे की वजह यह है कि पाकिस्तान के लाखों श्रमिक सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों में रहते हैं। पिछले साल ही पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों को और मजबूत किया है, जिसके तहत एक औपचारिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामकता को दोनों के खिलाफ आक्रामकता मानने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
क्या है पाकिस्तान का रूख
बता दें कि ईरान जैसे-जैसे ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों से खाड़ी देशों को निशाना बना रहा है, वैसे-वैसे पाकिस्तान के लिए चुनौती बढ़ती जा रही है।
पाकिस्तान से बार-बार यह सवाल पूछा जा रहा है कि अगर वह इस जंग में घसीटा गया तो उसकी अगली प्रतिक्रिया क्या होगी?
इसको लेकर पाकिस्ता का कहन है कि ह ईरान और सऊदी अरब सहित क्षेत्रीय नेताओं से लगातार फोन पर बातचीत कर रहा है।
पाकिस्तान ने की थी निंदा
गौरतलब है कि जब 28 फरवरी को इजरायल-अमेरिका द्वारा तेहरान में किए गए हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत हो गई, तो पाकिस्तान ने इन हमलों की निंदा करते हुए इन्हें अनुचित बताया। हालांकि, कुछ देर बाद पाकिस्तान ने ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए हमले की भी निंदा की और इसे संप्रभुता का घोर उल्लंघन बताया।
हमारा सऊदी के साथ समझौता है…
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार, पिछले सप्ताह संघर्ष शुरू होने के समय रियाद में इस्लामिक सहयोग संगठन की बैठक में भाग ले रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा, “हमारा सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है और पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है, मैंने ईरानी नेतृत्व से कहा है कि वे सऊदी अरब के साथ हमारे समझौते का ध्यान रखें।”
शहाबज शरीफ ने किया था ईरान का दौरा
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पिछले साल मई में ईरान का दौरा किया था, यह दौरा भारत के साथ पाकिस्तान के चार दिवसीय संघर्ष के कुछ दिनों बाद हुआ था। पाकिस्तान के लिए सबसे जटिल कारक यह है कि यदि रियाद सैन्य सहायता का आह्वान करता है तो वह ईरान को केवल एक शत्रु के रूप में मानने का जोखिम नहीं उठा सकता।