अमेरिका ने दावा किया है कि चीन ने भूकंपीय निगरानी की प्रभावशीलता को कम करने के तरीके का इस्तेमाल करके गुप्त परमाणु विस्फोटक परीक्षण किए।
ये परीक्षण 2020 में गलवान झड़प के बाद किए गए थे।
अमेरिकी विदेश उप सचिव थॉमस जी डिनानो ने कहा कि चीन ने 22 जून, 2020 को ऐसा ही एक उपज पैदा करने वाला परमाणु परीक्षण किया था।
यह गलवान झड़प के ठीक एक हफ्ते बाद की बात है, जब भारत की रक्षा करते हुए 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे और 30 से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए थे।
दुनिया से छिपाने के लिए किया इस तरीके का इस्तेमाल
अमेरिकी अधिकारी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “चीन ने न्यूक्लियर एक्सप्लोसिव टेस्ट किए, जिसमें सैकड़ों टन की तय क्षमता वाले टेस्ट की तैयारी भी शामिल है।
चीन ने अपनी गतिविधियों को दुनिया से छिपाने के लिए डीकपलिंग (भूकंपीय निगरानी की प्रभावशीलता को कम करने का एक तरीका) का इस्तेमाल किया है। चीन ने 22 जून, 2020 को ऐसा ही क्षमता वाला एक न्यूक्लियर टेस्ट किया था।”
खतरों के बारे में भी किया आगाह
अमेरिकी अधिकारी डिनानो ने एक नए आर्किटेक्चर की जरूरत पर जोर दिया, जो आज के खतरों से निपटे, न कि बीते हुए समय के खतरों से।
डिनानो ने चीन द्वारा किए गए न्यूक्लियर एक्सप्लोसिव टेस्ट की पूरी प्रक्रिया और इसके खतरे के बारे में भी बताया।
उन्होंने तैनात रणनीतिक परमाणु हथियारों की संख्या को काफी कम करने के लिए डिजाइन की गई सामरिक शस्त्र न्यूनीकरण संधि का जिक्र करते हुए कहा, “न्यू START पर 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे और 2026 में वॉरहेड्स और लॉन्चर्स पर इसकी लिमिट्स अब काम की नहीं रहेंगी।
एक परमाणु शक्ति अपने हथियारों का जखीरा पहले से कहीं ज्यादा बड़े पैमाने और रफ्तार से बढ़ा रही है और न्यू START की शर्तों से बिना किसी रोक-टोक के बड़े पैमाने पर न्यूक्लियर सिस्टम्स को बनाए रखना और विकसित करना जारी रखे हुए है।”
अमेरिकी अधिकारी ने कहा, “अमेरिका की लगभग सभी तैनात न्यूक्लियर फोर्स न्यू START के दायरे में थीं, जबकि रूस के बहुत बड़े जखीरे का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही इसके दायरे में था। चीन के एक भी न्यूक्लियर हथियार न्यू START के दायरे में नहीं थे।”