सिर्फ शादी का वादा पूरा न होने पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता, सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द की…

सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज प्राथमिकी (एफआइआर) को यह कहते हुए रद कर दिया कि यह सहमति से बने संबंधों में कड़वाहट आने का एक विशिष्ट मामला है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि हर रिश्ता जो शादी तक नहीं पहुंचता, उसे ”झूठा वादा” या दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, विशेषकर जब संबंध आपसी सहमति से रहे हों।

पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पिछले वर्ष मार्च के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें आरोपित के खिलाफ बिलासपुर में फरवरी 2025 में दर्ज एफआइआर से संबंधित कार्यवाही को रद करने से इन्कार कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता कि शादी का वादा पूरा नहीं हुआ। कोर्ट ने टिप्पणी की, ”तथ्य स्पष्ट रूप से इशारा करते हैं कि यह आपसी सहमति से बने संबंधों के कड़वाहट में बदलने का मामला है। ऐसे मामलों में पक्षों को संयम बरतना चाहिए था और अपने व्यक्तिगत रिश्तों के विवाद में राज्य (कानूनी मशीनरी) को शामिल करने से बचना चाहिए था।”

इस मामले के तथ्य काफी चौंकाने वाले थे। शिकायतकर्ता और आरोपित दोनों ही वकील हैं। शिकायतकर्ता एक 33 वर्षीय विवाहित महिला है और एक बच्चे की मां भी है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जब महिला पहले से ही विवाहित थी और उसका तलाक का मामला लंबित था, तो वह आरोपित के साथ शादी करने के लिए कानूनी रूप से पात्र नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि कानून द्विविवाह की अनुमति नहीं देता है। एक वकील होने के नाते, महिला को इस कानूनी स्थिति का पता होना चाहिए था। पीठ ने कहा, ”’यह मानना कठिन है कि शिकायतकर्ता, जो खुद एक वकील है, कानून की इस स्थिति से अनजान थी और उसे शादी के बहाने यौन संबंध बनाने के लिए बरगलाया गया था।”’

कोर्ट ने उन पुराने फैसलों का भी हवाला दिया जिनमें टूटे हुए रिश्तों को ‘आपराधिक रंग’ देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई थी।

कोर्ट ने कहा कि अदालतों को उन वास्तविक मामलों और उन मामलों के बीच अंतर करना चाहिए जो केवल आपसी विवाद या भविष्य में मन बदलने के कारण दर्ज कराए जाते हैं।

पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता कोई भोली-भाली महिला नहीं थी जो निर्णय लेने में अक्षम हो। उसे पहले से ही बोझ तले दबी सरकारी मशीनरी को आपराधिक मुकदमों में उलझाने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था।

अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपित के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से निराधार हैं और फरवरी 2025 में बिलासपुर में दर्ज की गई एफआइआर और उसके बाद की सभी कार्यवाहियों को रद कर दिया।

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