ईमानदार अधिकारियों को बेवजह की मुकदमेबाजी से बचाने की जरूरत, आर्थिक सर्वेक्षण में CAG-CVC जैसी संस्थाओं को सलाह…

भारत को जिस ‘उद्यमशील राज्य’ की सख्त जरूरत है, उसके लिए ईमानदार अधिकारियों को निरर्थक और परेशान करने वाले अभियोजन से संरक्षण देना अनिवार्य है। यह बात आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कही गई है, जिसे गुरुवार को संसद में पेश किया गया।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश सर्वेक्षण में कहा गया है कि कानूनी और संस्थागत ढांचे ऐसे होने चाहिए, जो सद्भावना में लिए गए निर्णयों को सुरक्षा प्रदान करें और गलती व भ्रष्टाचार के बीच स्पष्ट अंतर तय करें।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि हर नकारात्मक नतीजा न तो गलत मंशा का परिणाम होता है और न ही अक्षमता का। कई बार विफलताएं अनुमानों की चूक, समय, समन्वय या जवाबदेही के समय-चक्र से जुड़ी होती हैं।

इसमें नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) और सतर्कता संस्थाओं के ²ष्टिकोण में बदलाव की जरूरत पर बल दिया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार, “पूर्व-निर्धारित स्पष्टता और बाद की अनुपातिक समीक्षा, वास्तविक समय की सख्त निगरानी से अधिक महत्वपूर्ण है।”

सर्वेक्षण में कहा गया है कि आने वाले दशकों में भारत को ऐसे फैसले लेने होंगे, जिनके लिए कोई तयशुदा मार्गदर्शिका नहीं होगी। ऐसे में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश अनिश्चितता के बीच सीखने, सुधार करने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने में कितना सक्षम है।

जापान के युद्धोत्तर अनुभव का हवाला देते हुए सर्वेक्षण में कहा गया है कि वहां नीतिगत विफलताओं को सीख के अवसर के रूप में देखा गया, न कि दंड का आधार।

इसमें यह भी उल्लेख किया गया कि भारत में अक्सर नीतिगत सुधार या दिशा परिवर्तन को अयोग्यता का संकेत मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह संस्थागत परिपक्वता का प्रतीक हो सकता है।

लोकतंत्र की जटिलताओं पर चर्चा करते हुए सर्वेक्षण में कहा गया कि राजनीतिक नेतृत्व को दिशा तय करनी चाहिए, जबकि नौकरशाही को समाधान खोजने और नीतिगत औजारों को अनुकूलित करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

एक उद्यमशील देश वही होगा, जिसकी संस्थाएं गलतियों से डरने के बजाय उनसे सीखने की क्षमता विकसित करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *