उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि वह और कितने लोगों को समाहित कर सकती है, उसका ब्योरा दे।
कोर्ट ने ये बात तब कही, जब आरक्षित वर्ग की ओर से कहा गया कि वे सामान्य वर्ग के उन लोगों को नौकरी से निकाले जाने की मांग नहीं कर रहे जिन्हें नौकरी मिल चुकी है और नौकरी कर रहे हैं।
उनका अनुरोध है कि कोर्ट उनके मामले पर भी विचार करे, क्योंकि वे लोग 2020 से कोर्ट का चक्कर काट रहे हैं। वे हाई कोर्ट में याची थे और सुप्रीम कोर्ट में प्रतिवादी हैं। इस अनुरोध पर कोर्ट ने प्रदेश सरकार से 10 दिन में ब्योरा देने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा ब्योरा
ये निर्देश जस्टिस दीपांकर दत्ता और एजी मसीह की पीठ ने बुधवार को उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती मामले में सुनवाई के दौरान दिए। ज्ञातव्य हो कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 2018 में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती की अधिसूचना निकाली थी।
इस मामले में हाई कोर्ट ने चयन सूची रद करके राज्य सरकार को नए सिरे से सूची बनाने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ अनारक्षित वर्ग के नौकरी पा चुके अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है। दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने अर्जियां दाखिल की हैं और वे सामान्य वर्ग की याचिका में प्रतिवादी हैं।
आरक्षित वर्ग के समायोजन पर सवाल उठाया
सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई में हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। बुधवार को यह मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई पर लगा था।
सुनवाई के दौरान आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मनीष गोस्वामी ने कहा कि इस भर्ती में आरक्षित वर्ग के साथ अन्याय हुआ है। वे लोग 2020 से न्याय मांग रहे हैं। पहले हाई कोर्ट में याची के तौर पर थे और अब सुप्रीम कोर्ट में प्रतिवादी हैं।
अगली सुनवाई 20 फरवरी को होगी
गोस्वामी ने कहा कि वे नौकरी पा चुके सामान्य वर्ग के लोगों का विरोध नहीं कर रहे और न ही उनकी मांग है कि उन्हें नौकरी से बाहर निकाला जाए। उनकी सिर्फ इतनी मांग है कि उनके मामलों पर भी विचार किया जाए। गोस्वामी ने कहा कि कुल एक लाख 26 हजार पद हैं।
ऐसे में उन्हें भी नियुक्ति दी जा सकती है। आरक्षित वर्ग की ओर से की गई इस मांग पर कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील से आरक्षित वर्ग को समाहित किए जाने के बारे में पूछा।
कोर्ट ने कहा कि कितने और लोगों को समाहित किया जा सकता है। प्रदेश सरकार के वकील ने निर्देश लेकर बताने की बता कही, जिस पर कोर्ट ने राज्य सरकार से 10 दिन में जवाब मांगा है। मामले में 20 फरवरी को फिर सुनवाई होगी।