विवाह-पूर्व संबंध से जन्मी संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति की, तलाक मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम फैसला…

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि विवाह पूर्व संबंध से जन्मी संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति की है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत विवाह के पूर्व संबंधों के कारण जन्मी संतान भी पिता से भरण-पोषण पाने का अधिकार रखती है।

इस कानून का मुख्य उद्देश्य समाज में बेसहारा और दर-दर भटकने की स्थिति को रोकना है।यह मामला बेमेतरा जिले के एक युवक से संबंधित है, जिसकी शादी अप्रैल 2016 में हुई थी। शादी के बाद गौना की रस्म मई 2016 में हुई, जिसके बाद पत्नी अपने ससुराल आई।

गौना के केवल पांच महीने बाद ही अक्टूबर 2016 में पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया। पति ने आरोप लगाया कि गौना से पहले उनके बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं बने थे, इसलिए वह बच्चा उसका नहीं है।

इसी विवाद के चलते पति ने फैमिली कोर्ट में विवाह विच्छेद का मामला दायर किया। फैमिली कोर्ट ने पति को इस आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति दी कि वह संतान के भरण-पोषण के लिए पत्नी को हर महीने एक हजार रुपये देगा।

फैमिली कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में पति ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने तलाक की डिक्री पारित करते हुए बच्चे को उसकी जैविक संतान नहीं माना है।

याचिका के अनुसार, जब वह बच्चा उसका जैविक संतान नहीं है, तो भरण-पोषण की जिम्मेदारी वह क्यों उठाए? याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 में दिए गए प्रविधान के अनुसार, अजैविक संतान भी अपने पिता से भरण-पोषण पाने का अधिकार रखती है।

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